लंदन। ईस्ट इंडिया कंपनी। आज भी इसका नाम सुनकर करोड़ों हिंदुस्तानियों का खून खौल जाता है। सारे जख्म हरे हो जाते हैं। कई बुरी यादें जो जुड़ी हैं इससे। ..यह आई तो व्यापार करने के लिए थी, लेकिन छल-कपट से इसने देश पर पूरे एक शताब्दी तक राज किया। एक बार फिर यह कंपनी भारत आ रही है..! मकसद भी व्यापार करना ही है। पर डरिए नहीं, न तो देश में अब पहले जैसे हालात हैं और न ही इस कंपनी का मालिक कोई अंग्रेज। बल्कि हमारे लिए गर्व की बात यह है कि इस कंपनी को एक भारतीय ने ही खरीदा है। वही अब इसे लेकर भारत आ रहे हैं।
पहले कभी मसालों का व्यापार करने वाली कंपनी अभी चाय, काफी, अचार, चाकलेट, फर्नीचर, चमड़े का सामान वगैरह बेचती है। वर्ष 2004 में भारतीय मूल के उद्योगपति संजीव मेहता ने इस कंपनी के सभी शेयर खरीद लिए थे। यह सौदा 2 करोड़ पौंड [करीब 1.45 अरब रुपये] में हुआ था।
ब्रिटेन के अखबार 'द टाइम्स' को दिए गए साक्षात्कार में संजीव ने बताया, 'एक भारतीय होने के नाते मेरे लिए सबसे खास बात यह है कि मैं एक ऐसी कंपनी का मालिक हूं, जिसकी हुकूमत हमारे देश पर कई साल तक रही। अपने देश में इस कंपनी के स्वामी के तौर पर लौटना बेहद अलग अनुभूति है।' मेहता ने माना कंपनी को ब्रैंड बनाने में उनकी कोई भूमिका नहीं रही। यह तो इतिहास की देन है। ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना एजिलाबेथ प्रथम ने वर्ष 1600 में की थी। 1 जनवरी, 1874 को भारत सरकार अधिनियम के तहत ब्रिटिश सरकार ने इसके सारे अधिकार अपने पास रख लिये। तभी कंपनी को भंग कर दिया गया था।
मेहता को उम्मीद है कि वर्ष 2012 की पहली तिमाही से कंपनी मुनाफा कमाना शुरू कर देगी और 2015 तक इसका कारोबार 6.5 करोड़ पौंड [करीब 4.73 अरब रुपये] तक पहुंच जाएगा। कंपनी रिटेल कारोबार में अपनी स्थिति को मजबूत करना चाहती है। इसी के तहत यह कंपनी इस साल लंदन, भारत और मध्यपूर्व में अपने बिक्री केंद्र खोलेगी। इन आउटलेट में कंपनी चाय, काफी, मसाले और फैब्रिक्स बेचेगी। इसके बाद कंपनी की इसी तरह के आउटलेट जापान, रूस और अमेरिका में भी खोलने की योजना है।