जब घर में नया मेहमान आने वाला होता है, तब सब उसके आने की जोर-शोर से तैयारियां करने लगते हैं। सब एक स्वस्थ बच्चे का इंतजार करते हैं, लेकिन यदि समय से पहले बच्चे का जन्म हो जाए और स्वस्थ बच्चे के बजाय कमजोर बच्चा जन्म ले ले तो घर का सारा वातावरण प्रभावित हो उठता है। माता-पिता चिंता में होते ही हैं, साथ ही उनको एक डर सताने लगता है कि कहीं गर्भावस्था के दौरान उनसे कहीं कोई गलती तो नहीं हो गई, जिससे ऎसा हुआ। उनके मन में कई सवाल उठते हैं। बच्चे को मां की गोद में लानेे के बजाय सीधे निओनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट (एनआईसीयू) ले जाया जाता है। देखते ही देखते पिछले कुछ सालों में प्रीमैच्योर बेबीज के मामले काफी बढे हैं। फिलहाल भारत में जन्म लेने वाले बच्चों में से 10 से 12 प्रतिशत बच्चे प्रीमैच्योर होते हैं।
आइसैक न्यूटन(वैज्ञानिक), अमेरिका के पूर्व प्रधानमंत्री विस्टन चर्चिल, कलाकार पिकासो और विश्व प्रसिद्ध यौद्धा नेपोलियन बोनापार्ट जैसी महान हस्तियों का जन्म भी सामान्य नौ महीने से पहले ही हो गया था। ये भी प्रीमैच्योर बच्चे ही थे। ये उन माता-पिता के लिए मिसाल हैं, जो प्रीमैच्योर बच्चे के होने से परेशान हैं, जिनके मन में अपने बच्चे के जन्म को लेकर कई सवाल होते हैं। यदि आप भी इनका सही तरह से ख्याल रखेंगे तो इनमें और सामान्य बच्चों में कोई फर्क नहीं होगा।
कौन है प्रीमैच्योर बेबीज
गर्भावस्था का सामान्य समय 40 हफ्तों या 9 महीनों का होता है। जिन बच्चों का जन्म 37 हफ्तों या आठ महीने पूरे होने के पहले ही हो जाता है, उसे प्रीमैच्योर बेबी या प्रीटर्म बेबी कहते हैं। बच्चा जितनी जल्दी पैदा होता है, उसके बचने की संभावना उतनी ही कम होती है। मां के गर्भ में मिलने वाला पोषण, ऑक्सीजन, संक्रमण से सुरक्षा और सही तापमान समय से पहले छिनने की वजह से ये बाहर सामान्य बच्चे की तरह सुरक्षित नहीं रहते और इनकी जान को खतरा होता है। भारत में हर साल इनके जन्म लेने का प्रतिशत 10 से 12 प्रतिशत है, जो विकसित देशों से कहीं ज्यादा है।
क्या है कारण
21 साल से पहले गर्भधारण करने पर मां का गर्भाशय पूरी तरह विकसित नहीं होता, ऎसे में भी बच्चा समय से पहले हो सकता है।
मां का वजन जरूरत से ज्यादा कम हो।
मां को अनीमिया हो (एचबी 8 जीएम से कम हो)।
गर्भावस्था के दौरान खून निकल जाए।
गर्भाशय में बच्चे को रखने की क्षमता न हो यानी गर्भाशय कमजोर हो।
मां को संक्रमण हो जाए।
यूटरेस का आकार सामान्य से छोटा हो।
कुछ कारणों की वजह से जबरदस्ती बच्चे का जन्म समय से पहले करवाना पड़े। जैसे बच्चे तक जरूरत के अनुसार खून का नहीं पहुंच पाना, गर्भ के अंदर का सही तरीके से विकास हो पाना, गर्भ के अंदर बच्चे तक सही तरह से ऑक्सीजन न पहुंच पाना। या मां को कोई ऎसी बीमारी हो जिससे गर्भावस्था के दौरान उसकी जान को खतरा हो।
कैसे रोक सकते हैं इसे
गर्भावस्था के दौरान सावधानियां रखकर बच्चे को सही समय पर जन्म दे सकते हैं, जैसे :
गर्भवती मां गर्भावस्था के दौरान कम से कम 3 से 4 बार चेकअप के लिए जाएं, जिसे "एंटीनेटल चेकअप कहते हैं।"
प्रेगनेंसी प्लान करने से पहले व गर्भावस्था के शुरूआती 3 महीने तक फॉलिक एसिड की गोलियां लेने से बच्चे में जन्म के दौरान होने वाली दिमाग संबंधी विकृतियों को रोका जा सकता है।
यदि समय से पहले डिलीवरी करनी ही पड़े तो मां को दो डोस "डेक्स्ट्रामिथासोन" के देने से बच्चे के फेफड़े अच्छी तरह से विकसित होते हैं और उसे सांस संबंधी समस्या नहीं होती।
हीमोग्लोबिन कम होने पर इसे बढ़ाने के लिए सही भोजन लें।
खाने-पीने का रखें ध्यान
ऎसे बच्चों को मां का दूध पीने में काफी समस्या होती है। इन्हें मां के स्तन से दूध पीने और इसे निगलने में परेशानी होती है। जहां तक मां के पहले दूध "कॉलेस्ट्रॉम" की बात है, इसे किसी और तरीके से दिया जाता है जो बच्चे की प्रतिरोधक क्षमता के लिए बहुत जरूरी होता है। खाने के अलावा बच्चे के शरीर का तापमान, उसकी सांस लेने की क्षमता, संक्रमण से बचाव इन बातों पर खास ध्यान देना होता है।
एनआईसीयू
समय से पहले गर्भ से बाहर आने की वजह से ये बच्चे मां के गर्भ में मिल रहे पोषण, ऑक्सीजन, संक्रमणरहित वातावरण, ऑक्सीजन और सही तापमान से वंचित हो जाते हैं, इसलिए कमजोर होते हैं। इसी कारण इन्हें एनआईसीयू में रखा जाना जरूरी होता है, जिससे उसका सामान्यविकास हो सके। एनआईसीयू में बच्चे को बेहतर वातावरण मिलता है। इसमें बच्चे को संक्रमण न होने का भी खास ख्याल रखा जाता है। जब बच्चे के शरीर का तापमान सामान्य हो जाता है, वह मां का दूध सीधे पी सकता है और उसका वजन 2 से 2.5 किलो से बढ़ जाता है तो उसे एनआईसीयू से डिस्चार्ज कर दिया जाता है।
एनआईसीयू के बाद
डॉक्टर के बताए अनुसार बच्चे को दूध पिलाएं।
उसके वजन का ध्यान रखें कि वजन बढ़ रहा है कि नहीं।
बच्चे को गर्म रखें।
संक्रमण से बचने के लिए डॉक्टरी सलाह का ध्यान रखें।
डॉक्टर के बताए अनुसार नियमित जांच के लिए जाएं।
छह महीने तक बच्चे को अच्छी तरह से दूध पिलाएं।
बच्चे के दिमाग का विकास करने के लिए उसे प्यार से छूते रहें। हलके गानों, धीमी आवाज, आंखों के संपर्क से उसे विकसित करने की कोशिश करें।
रखें कि जब बच्चे का रंग नीला हो तो उसे ऑक्सीजन की कमी हो रही, पीला रंग होने पर उसे पीलिया है और सफेद रंग होने पर उसे अनीमिया है। इन अवस्थाओं में बच्चे को तुरंत डॉक्टर के पास ले जाएं।
डॉ. जीएस पटेल, एमडी
बाल रोग विशेषज्ञ, प्रोफेसर पीडियाट्रिक