हिन्दी सिने जगत में फिल्मकार के आसिफ को एक ऎसी शख्सियत के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने तीन दशक लंबे सिने करियर में अपनी फिल्मों के जरिए दर्शकों के दिल पर अमिट छाप छोड़ी। उन्होंने अपने सिने करियर में महज तीन-चार फिल्मों का निर्माण या निर्देशन किया, लेकिन जो भी काम किया, पूरी शिद्दत और जुनून के साथ किया। यही वजह है कि फिल्में बनाने की उनकी रफ्तार काफी धीमी रहती थी और उन्हें इसके लिए आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ता था।
मामा का साथ
के आसिफ (मूल नाम कमरूद्दीन आसिफ) का जन्म 14 अप्रेल, 1922 को उत्तर प्रदेश के इटावा में एक मध्यम वर्गीय मुस्लिम परिवार में हुआ। चालीस के दशक में जीवन यापन के लिए वे अपने मामा नजीर के पास मुंबई आ गए, जहां उनकी कपड़े सिलने की दुकान थी। उनके मामा फिल्मों में कपड़े सप्लाई किया करते थे। साथ ही उन्होंने छोटे बजट की एक-दो फिल्मों का निर्माण भी किया था। आसिफ अपने मामा के काम में हाथ बंटाने लगे। इसी दौरान उन्हें अपने मामा के साथ फिल्म स्टूडियो जाने का मौका मिलने लगा और धीरे-धीरे फिल्मों के प्रति उनकी रूचि बढ़ती गई।
शुरूआत "फूल" से
वर्ष 1945 में बतौर निर्देशक उन्होंने फिल्म "फूल" से सिने करियर की शुरूआत की। पृथ्वीराज कपूर, सुरैया और दुर्गा खोटे जैसे बड़े सितारों वाली यह फिल्म टिकट खिड़की पर सुपरहिट साबित हुई। इस फिल्म की सफलता के बाद उन्होंने अपनी महत्वाकांक्षी फिल्म "मुगले आजम" बनाने का निश्चय किया और शहजादे सलीम की भूमिका के लिए चंद्रमोहन, अनारकली की भूमिका के लिए वीणा और अकबर की भूमिका के लिये सप्रू का चुनाव किया। स्टार कास्ट को लेकर कई तरह की परेशानियां आईं और आखिरकार मधुबाला के सामने अनार कली की भूमिका निभाने का प्रस्ताव रखा और अकबर के किरदार के लिए पृथ्वीराज कपूर का चयन किया गया। सलीम की भूमिका दिलीप कुमार को दी गई। फिल्म का निर्माण वर्ष 1951 में शुरू हुआ। हालांकि फिल्म बनने में काफी वक्त लगा।
दस साल बाद
इसी दौरान उन्होंने दिलीप कुमार, नरगिस और बलराज साहनी को लेकर फिल्म "हलचल" का निर्माण शुरू किया। वर्ष 1951 में प्रदर्शित यह फिल्म टिकट खिड़की पर सफल साबित हुई। फिल्म "मुगले आजम" के निर्माण में उन्हें काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। इसके निर्माण में लगभग 10 साल लग गए, जबकि सलीम अनारकली की प्रेम कहानी पर बनी एक अन्य फिल्म "अनारकली" प्रदर्शित होकर सुपरहिट भी हो गई। वर्ष 1960 में जब "मुगले आजम" प्रदर्शित हुई तो इसने टिकट खिड़की पर सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। फिल्म का संगीत उन दिनों काफी लोकप्रिय हुआ।
सिर्फ चंद फिल्में
फिल्म "मुगले आजम" की सफलता के बाद उन्होंने राजेन्द्र कुमार और सायरा बानो को लेकर "सस्ता खून मंहगा पानी"का निर्माण शुरू किया, लेकिन कुछ दिनों की शूटिंग के बाद उन्होंने इस फिल्म का निर्माण बंद कर दिया और
गुरूदत्त और निम्मी को लेकर लैला मजनूं की कहानी पर आधारित "मोहब्बत और खुदा" का निर्माण आरंभ कर दिया। वर्ष 1964 में गुरूदत्त की असमय मृत्यु के बाद उन्होंने गुरूदत्त की जगह अभिनेता संजीव कुमार को काम करने का मौका दिया, लेकिन उनका यह सपना पूरा नहीं हुआ और 9 मार्च 1971 को दिल का दौरा पड़ने से वे इस दुनिया को अलविदा कह गए। बाद में उनकी पत्नी अख्तर के प्रयास से यह
फिल्म वर्ष 1986 में प्रदर्शित हुई। आसिफ ने तीन शादियां कीं। उनकी पहली बीवी का नाम सितारा देवी था लेकिन यह संबंध ज्यादा दिन तक नहीं चल पाया और उनका अलगाव हो गया। इसके बाद उन्होंने अभिनेत्री निगार के साथ निकाह किया। यह संबध भी कुछ खास नहीं चला। फिर उन्होंने अख्तर के साथ शादी की।