(प्रदीप कुमार )-New Parliament Budling- प्रधानमंत्री मोदी 28 मई को नवनिर्मित संसद भवन का उद्घाटन करेंगे हालांकि विपक्ष ने राष्ट्रपति को न्योता ना मिलने को मुद्दा बनाते हुए समारोह के बहिष्कार का निर्णय लिया है विपक्ष का कहना है क्योंकि राष्ट्रपति मूर्मू को पूरी तरह से दरकिनार करके उद्घाटन करना ना सिर्फ़ महामहिम का घोर अपमान है वरन हमारे लोकतंत्र पर गहरा हमला है
विपक्ष का कहना है कि संविधान के अनुच्छेद 79 में यह स्पष्ट है कि संसद का मतलब राष्ट्रपति, राज्यसभा एयर लोक सभा है ।विपक्ष ने आरोप लगाया है कि उद्घाटन का हक़ सिर्फ़ और सिर्फ़ महामहिम राष्ट्रपति का है प्रधानमंत्री उनका यह तिरस्कार क्यों कर रहे हैं?बहिष्कार को लेकर विपक्षी दलों ने ताजा बयान जारी किया है।समान विचारधारा वाले विपक्षी दलों द्वारा जारी संयुक्त वक्तव्य में कहा गया है कि नए संसद भवन का उद्घाटन एक महत्वपूर्ण अवसर है। हमारे इस विश्वास के बावजूद कि सरकार लोकतंत्र को खतरे में डाल रही है, और जिस निरंकुश तरीके से नई संसद का निर्माण किया गया था, उसकी हमारी अस्वीकृति के बावजूद हम अपने मतभेदों को दूर करने और इस अवसर को चिह्नित करने के लिए तैयार थे। हालाँकि, राष्ट्रपति मुर्मू को पूरी तरह से दरकिनार करते हुए, नए संसद भवन का उद्घाटन करने का प्रधानमंत्री मोदी का निर्णय न केवल एक गंभीर अप है, बल्कि हमारे लोकतंत्र पर सीधा हमला है, जो इसके अनुरूप प्रतिक्रिया की मांग करता है।
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विपक्षी दलों के इस साझा बयान में आगे कहा गया है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 79 में कहा गया है कि “संघ के लिए एक संसद होगी जिसमें राष्ट्रपति और दो सदन होंगे जिन्हें क्रमशः राज्यों की परिषद और लोगों की सभा के रूप में जाना जाएगा।” राष्ट्रपति न केवल भारत में राज्य का प्रमुख होता है, बल्कि संसद का एक अभिन्न अंग भी होता है। वह संसद को बुलाती हैं, सत्रावसान करती हैं और संबोधित करती हैं। संक्षेप में, राष्ट्रपति के बिना संसद कार्य नहीं कर सकती है। फिर भी, प्रधानमंत्री ने उनके बिना नए संसद भवन का उद्घाटन करने का निर्णय लिया है। यह अशोभनीय कृत्य राष्ट्रपति के उच्च पद का अपमान करता है, और संविधान के पाठ और भावना का उल्लंघन करता है। यह सम्मान के साथ सबको साथ लेकर चलने की उस भावना को कमजोर करता है जिसके तहत देश ने अपनी पहली महिला आदिवासी राष्ट्रपति का स्वागत किया था।
अपने बयान में विपक्ष ने कहा है कि संसद को लगातार खोखला करने वाले प्रधानमंत्री के लिए अलोकतांत्रिक कृत्य कोई नई बात नहीं है। संसद के विपक्षी सदस्यों को अयोग्य, निलंबित और मौन कर दिया गया है जब उन्होंने भारत के लोगों के मुद्दों को उठाया। सत्ता पक्ष के सांसदों ने संसद को बाधित किया है। तीन कृषि कानूनों सहित कई विवादास्पद विधेयकों को लगभग बिना किसी बहस के पारित कर दिया गया है और संसदीय समितियों को व्यावहारिक रूप से निष्क्रिय कर दिया गया है। नया संसद भवन सदी में एक बार आने वाली महामारी के दौरान बड़े खर्च पर बनाया गया है, जिसमें भारत के लोगों या सांसदों से कोई परामर्श नहीं किया गया है, जिनके लिए यह स्पष्ट रूप से बनाया जा रहा है।
इस बयान में विपक्ष ने आगे कहा है कि जब लोकतंत्र की आत्मा को संसद से निष्कासित कर दिया गया है, तो हमें नई इमारत में कोई मूल्य नहीं दिखता। हम नए संसद भवन के उद्घाटन का बहिष्कार करने के अपने सामूहिक निर्णय की घोषणा करते हैं। हम इस निरंकुश प्रधान मंत्री और उनकी सरकार के खिलाफ शब्दों और भावनाओं में लड़ना जारी रखेंगे और अपना संदेश सीधे भारत के लोगों तक ले जाएंगे।
जिन विपक्षी दलों ने संसद भवन के उद्घाटन के बहिष्कार करने का निर्णय किया है उनमें कांग्रेस, टीएमसी, डीएमके,जेडीयू,एनसीपी,सीपीएम, सीपीआई,आरजेडी,आम आदमी पार्टी, शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे ), नेशनल कांफ्रेंस,केरल कांग्रेस,समाजवादी पार्टी,राष्ट्रीय लोकदल,इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग,रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी, एमडीएमके,झारखंड मुक्ति मोर्चा शामिल है।
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