तमिलनाडु में विल्लुपुरम के कुछ कारीगर इन दिनों बड़ी कुशलता और सटीकता के साथ मिट्टी के बर्तन (Earthenware) बनाने में जुटे हैं। इस जिले के सलाई अगरम गांव में रहने वाले कारीगरों की व्यस्तता काफी बढ़ गई है। जैसे-जैसे गर्मी बढ़ रही है और और गैस किल्लत बढ़ी है, पारंपरिक मिट्टी के बर्तनों की मांग भी तेज हो रही है। लोग प्लास्टिक की बोतलों और फ्रिज के बजाय इन्हें प्राथमिकता दे रहे हैं। Earthenware
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परंपरा को आधुनिक जरूरतों के साथ जोड़ते हुए इन सामानों को हाथ से अलग-अलग आकार और डिजाइन में बनाया जा रहा है। कारीगर बताते हैं कि मिट्टी के बर्तनों की मांग बढ़ने की खास वजह है। ये फ्रिज के पानी के मुकाबले ज्यादा सेहतमंद हैं। हालांकि, कुम्हारों का ये भी कहना है कि स्थानीय जल निकायों में प्रदूषण की वजह से अच्छी गुणवत्ता वाली मिट्टी मिलनी मुश्किल है। Earthenware
कुछ विक्रेताओं का कहना है कि मिट्टी के टम्बलर, बोतलों और मटकों की मांग में उछाल के साथ उन्हें रसोई गैस सिलेंडरों की कमी से भी फायदा हो रहा है, क्योंकि कई लोग अब मिट्टी के चूल्हे खरीदने लगे हैं। गर्मी बढ़ने के साथ मिट्टी के सामानों की मांग और बढ़ने की उम्मीद है। विल्लुपुरम के कारीगरों का कहना है कि उनके पास काफी काम है, क्योंकि उन्हें न सिर्फ स्थानीय ऑर्डर, बल्कि दूर-दराज से आने वाली मांगों को भी पूरा करना है। Earthenware
