28वाँ सीएसपीओसी दिल्ली में लोकतांत्रिक संस्थाओं को अधिक जन-केंद्रित बनाने की नवीकृत प्रतिबद्धता के साथ संपन्न

Delhi: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा गुरुवार को उद्घाटित राष्ट्रमंडल के अध्यक्षों एवं पीठासीन अधिकारियों का 28वाँ सम्मेलन (सीएसपीओसी) आज लोकतांत्रिक संस्थाओं को और अधिक जन-केंद्रित बनाने की नवीकृत प्रतिबद्धता के साथ संपन्न हुआ। दो-दिवसीय इस सम्मेलन के समापन सत्र में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने समापन संबोधन दिया। समापन सत्र के दौरान लोकसभा अध्यक्ष ने 29वें सीएसपीओसी की अध्यक्षता यूनाइटेड किंगडम के हाउस ऑफ कॉमन्स के अध्यक्ष माननीय सर लिंडसे होयल को सौंपी और लंदन में आयोजित होने वाले अगले सीएसपीओसी की सफलता के लिए उन्हें शुभकामनाएँ दीं।

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इस अवसर पर बिरला ने कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाएँ तभी सशक्त और प्रासंगिक बनी रह सकती हैं जब वे पारदर्शी, समावेशी, उत्तरदायी और जनता के प्रति जवाबदेह हों। उन्होंने कहा कि पारदर्शिता निर्णय-प्रक्रिया में खुलेपन को सुनिश्चित कर जनता के विश्वास को बढ़ाती है, जबकि समावेशन यह सुनिश्चित करता है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में प्रत्येक आवाज़, विशेषकर समाज के हाशिये पर खड़े लोगों की सुनी जाए और उसका सम्मान हो। उनके अनुसार, ये सिद्धांत मिलकर लोकतांत्रिक संस्थाओं की वैधता को बनाए रखते हैं और नागरिक तथा राज्य के बीच स्थायी संबंध को सुदृढ़ करते हैं।सीएसपीओसी की स्थापना के पीछे 56 वर्ष पूर्व की परिकल्पना को याद  करते हुए श्री बिरला ने कहा कि यह सम्मेलन राष्ट्रमंडल की लोकतांत्रिक विधायिकाओं के बीच सतत संवाद सुनिश्चित करने तथा संसदीय कार्यकुशलता और उत्तरदायित्व को बढ़ाने के नए उपायों की खोज के उद्देश्य से स्थापित किया गया था। उन्होंने कहा कि 28वें सीएसपीओसी ने इस विरासत को नई ऊर्जा और सार्थकता के साथ आगे बढ़ाया है। अध्यक्ष ने इस सम्मेलन की एक विशिष्ट विशेषता के रूप में सीएसपीओसी के इतिहास में सर्वाधिक देशों की अभूतपूर्व भागीदारी को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि यह व्यापक और समावेशी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करेगा कि नई दिल्ली सम्मेलन को राष्ट्रमंडल संसदीय सहयोग के इतिहास में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में स्मरण किया जाए।
सम्मेलन के  सत्रों पर चर्चा  करते हुए बिरला ने कहा कि संसदों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जिम्मेदार उपयोग, सोशल मीडिया के प्रभाव, चुनावों से परे नागरिक सहभागिता, तथा सांसदों और संसदीय कर्मचारियों के स्वास्थ्य एवं कल्याण जैसे विषयों पर हुई चर्चाएँ विशेष रूप से विचारोत्तेजक रहीं। उन्होंने कहा कि इन विमर्शों से पीठासीन अधिकारियों को उस महत्वपूर्ण दौर में अपनी विकसित होती भूमिकाओं और दायित्वों के बारे में अधिक स्पष्टता मिली, जहाँ लोकतांत्रिक परंपराएँ तीव्र तकनीकी परिवर्तन से विकसित हो रही हैं। उन्होंने आशा व्यक्त की  कि प्रौद्योगिकी, समावेशन और वैश्विक साझेदारियाँ नई विश्व व्यवस्था को आकार देंगी। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि सम्मेलन के दौरान आयोजित द्विपक्षीय बैठकों और अनौपचारिक संवादों ने सदस्य देशों के बीच मित्रता और समझ के बंधन को और सुदृढ़ किया है।ओम बिरला ने सभी प्रतिनिधिमंडलों की सक्रिय भागीदारी, उत्साह और रचनात्मक भावना के लिए गहन प्रशंसा व्यक्त की, जिसने सम्मेलन को सार्थक और स्मरणीय बनाया। उन्होंने कहा कि चर्चाओं से यह स्पष्ट हुआ कि संसदों को अधिक जन-केंद्रित, जवाबदेह और प्रभावी बनाने पर सामूहिक चिंतन के लिए सीएसपीओसी एक अद्वितीय मंच के रूप में आज भी प्रासंगिक है। उन्होंने ऐतिहासिक संविधान सदन में सम्मेलन का उद्घाटन करने और अपने प्रेरणादायी संबोधन के लिए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के प्रति हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त की, जिसमें भारत की समृद्ध लोकतांत्रिक विरासत और चुनौती के समय वैश्विक समुदाय के साथ खड़े रहने की उसकी दृढ़ प्रतिबद्धता को प्रभावशाली ढंग से रेखांकित किया गया। उन्होंने अंतर-संसदीय संघ के अध्यक्ष और राष्ट्रमंडल संसदीय संघ की अध्यक्ष की उपस्थिति और योगदान को भी सराहा, जिनकी सहभागिता से विचार-विमर्श और समृद्ध हुआ। उन्होंने भारत के माननीय उपराष्ट्रपति के प्रति भी आभार व्यक्त किया, जिन्होंने सम्मेलन में भाग लेने आए पीठासीन अधिकारियों से संवाद के लिए समय दिया। अध्यक्ष ने यूनाइटेड किंगडम के हाउस ऑफ कॉमन्स के अध्यक्ष माननीय सर लिंडसे होयल को अगले सीएसपीओसी की सफलता के लिए शुभकामनाएँ दीं तथा आगामी स्थायी समिति बैठकों के मेजबान पीठासीन अधिकारियों को भी शुभेच्छाएँ प्रेषित कीं।
राष्ट्रमंडल के अध्यक्षों एवं पीठासीन अधिकारियों का 28वाँ सम्मेलन (सीएसपीओसी) नई दिल्ली में संवाद, सहयोग और नवाचार के माध्यम से संसदीय लोकतंत्र को सुदृढ़ करने के प्रति आशावाद, एकजुटता और नवीकृत संकल्प के साथ संपन्न हुआ। दो-दिवसीय यह सम्मेलन परस्पर सम्मान, साझा लोकतांत्रिक मूल्यों और सकारात्मक सहभागिता के वातावरण में आयोजित ठोस, दूरदर्शी विमर्शों से चिह्नित रहा।
सहमति और असहमति; दोनों ही लोकतंत्र की विशिष्ट्ता  हैं: लोकसभा अध्यक्ष
सीएसपीओसी 2026 में बिरला ने विशेष पूर्णाधिवेशन की अध्यक्षता की इससे पहले  विशेष पूर्णाधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए श्री बिरला ने कहा कि आधुनिक लोकतंत्र अभूतपूर्व अवसरों के साथ-साथ जटिल, बहुआयामी चुनौतियों का भी सामना कर रहे हैं। उन्होंने जोर दिया कि पीठासीन अधिकारियों का प्रमुख दायित्व है कि वे समकालीन आवश्यकताओं के अनुरूप लोकतांत्रिक संस्थाओं को निरंतर अनुकूलित करें, और साथ ही संवैधानिक मूल्यों में दृढ़ता से निहित रहें। उन्होंने कहा कि संसदों की वास्तविक प्रासंगिकता नागरिकों की अपेक्षाओं और आकांक्षाओं के प्रति उनकी प्रतिक्रिया-क्षमता में निहित है, ताकि बहसें और विमर्श जन-समस्याओं के सार्थक समाधान तक पहुँचें। उनके अनुसार, व्यापक और गहन चर्चा सीधे तौर पर अधिक पारदर्शिता, जवाबदेही और विधायिकाओं में सार्वजनिक विश्वास के सुदृढ़ीकरण में योगदान देती है।
बिरला ने कहा कि सहमति और असहमति-दोनों ही लोकतंत्र की शक्तियाँ हैं, किंतु इन्हें संसदीय मर्यादा के ढाँचे के भीतर व्यक्त किया जाना चाहिए। इस संदर्भ में, उन्होंने सदन की गरिमा की रक्षा, निष्पक्षता सुनिश्चित करने और संस्थागत विश्वसनीयता को मजबूत करने में पीठासीन अधिकारी की भूमिका को निर्णायक बताया। उन्होंने बल दिया कि संसदें जनता की हैं और समाज के सभी वर्गों; सामाजिक पदानुक्रम में अंतिम व्यक्ति सहित की आवाज़ के लिए स्थान उपलब्ध कराना चाहिए। उन्होंने कहा कि बहसों में सदस्यों की व्यापक भागीदारी सुनिश्चित करना, सदन के समय का संतुलित उपयोग और सभी पक्षों को समान अवसर देना, पीठ की अनिवार्य जिम्मेदारियाँ हैं।बिरला ने डिजिटल परिवर्तन और सूचना क्रांति के युग में नागरिकों की बढ़ती अपेक्षाओं की ओर भी ध्यान आकृष्ट किया। उन्होंने कहा कि ई-संसद, कागज-रहित कार्यप्रणाली और डिजिटल डाटाबेस जैसी पहलों से विधायिकाओं में पारदर्शिता, कार्यकुशलता और उत्तरदायित्व में वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा कि भाषाई समावेशन सहित प्रौद्योगिकी का जिम्मेदार उपयोग अधिक नागरिक-केंद्रित संसदों के लिए एक प्रमुख सक्षमकर्ता है।
बिरला ने संसदीय स्थायी समितियों की महत्वपूर्ण भूमिका पर बल देते हुए कहा कि इन्हें प्रायः “लघु संसद” कहा जाता है, तथा बजट एवं अन्य विधायी प्रस्तावों की जाँच-पड़ताल में उनकी भूमिका संसदीय पर्यवेक्षण का उच्च मानक स्थापित करती है। उन्होंने संसद के प्रभावी संचालन को सुनिश्चित करने के लिए पीठासीन अधिकारियों से इन समितियों के गठन और उन्हें और अधिक सशक्त बनाने का आह्वान किया। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि विधायी प्रारूपण की प्रक्रिया की पीठासीन अधिकारियों द्वारा सतत एवं सूक्ष्म निगरानी की जानी चाहिए, क्योंकि संसद द्वारा पारित कानूनों का नागरिकों के जीवन पर प्रत्यक्ष और दूरगामी प्रभाव पड़ता है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने जनप्रतिनिधियों से आग्रह किया कि वे जनता की चिंताओं को अनुशासित, रचनात्मक और जिम्मेदार तरीके से सदन के समक्ष प्रस्तुत करें।

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