Delhi: शबरिमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर नो एंट्री, केंद्र सरकार ने दिया बड़ा बयान

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Delhi: केंद्र सरकार ने मंगलवार को उच्चतम न्यायालय में कहा कि केरल के शबरिमला मंदिर में मासिक धर्म की आयु वाली महिलाओं के प्रवेश पर लगी पाबंदी धार्मिक आस्था और संप्रदाय की स्वायत्तता के दायरे में आती है, और यह न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर है। केरल के शबरिमला मंदिर मामले में केंद्र की ओर से पेश हुए तुषार मेहता ने नौ-न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ को बताया कि यदि कोई प्रथा असंगत या अवैज्ञानिक है, तो उसका समाधान विधायिका के पास है।Delhi:

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प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली इस पीठ में न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना, न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह, न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले, न्यायमूर्ति आर. महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची भी शामिल हैं। मेहता ने पीठ से कहा, “हमें हर संप्रदाय की परंपरा का सम्मान करना होगा; हर चीज गरिमा या शारीरिक स्वतंत्रता से जुड़ी नहीं है। अगर मैं किसी मजार या गुरुद्वारे जाता हूं और मुझे सिर ढकना पड़ता है, तो क्या मैं कह सकता हूं कि मेरी गरिमा, अधिकार या पसंद की अनदेखी की गई?”Delhi: 

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मेहता ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति यह दावा करता है कि मानव बलि एक अनिवार्य धार्मिक प्रथा है और संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत अदालत में जाता है, तो अदालत को यह जांचने की आवश्यकता नहीं है कि यह प्रथा धार्मिक या अनिवार्य है या नहीं, बल्कि इसे सीधे सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य के उल्लंघन के आधार पर खारिज किया जा सकता है।मेहता ने कहा, “हम अदालत से यह स्पष्ट रूप से कहना चाहते हैं कि वह इस तरीके से प्रथाओं की समीक्षा न करे जिसमें यह पूछा जाए कि कोई प्रथा ‘तर्कसंगत’, ‘आधुनिक’, ‘वैज्ञानिक रूप से सही’, ‘न्यायिक सोच के अनुकूल’, ‘अलोकप्रिय’ या ‘संवैधानिक बदलाव या नैतिकता के सिद्धांतों’ पर आधारित है या नहीं। ऐसा करना संवैधानिक समीक्षा नहीं है।”Delhi: 

मेहता ने कहा कि संविधान में ‘संवैधानिक नैतिकता’ की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है।केंद्र ने अदालत को बताया, “यह ध्यान देने योग्य है कि ‘संवैधानिक नैतिकता’ संविधान में सीधे तौर पर मौजूद नहीं है। यह एक न्यायिक रूप से विकसित, अस्पष्ट और अनिर्धारित अवधारणा है। इसलिए ‘नैतिकता’ शब्द का विस्तार — जिसे संविधान में स्पष्ट रूप से ‘संवैधानिक नैतिकता’ के रूप में शामिल किया गया है — न केवल न्यायिक दखलअंदाजी माना जाएगा बल्कि यह संविधान में संशोधन के समान भी है।”Delhi:

शुरुआत में, उच्चतम न्यायालय ने सभी पक्षों के वकीलों से कहा कि वे तय समय सीमा का पालन करें और साथ ही स्पष्ट किया कि अतिरिक्त समय नहीं दिया जाएगा क्योंकि अन्य अहम मामले भी लंबित हैं। मामले की सुनवाई जारी है।सितंबर 2018 में, पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को हटाते हुए इसे अवैध और असंवैधानिक करार दिया था।बाद में 14 नवंबर 2019 को, तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने महिलाओं से भेदभाव के मुद्दे को 3:2 के बहुमत से बड़ी पीठ को भेज दिया था। इस फैसले में केवल शबरिमला ही नहीं, बल्कि मस्जिदों और दरगाहों में मुस्लिम महिलाओं के प्रवेश तथा गैर-पारसी पुरुषों से विवाह करने वाली पारसी महिलाओं के अगियारी (पवित्र अग्नि स्थल) में प्रवेश के मुद्दों को भी बड़ी पीठ के पास भेजा गया।शीर्ष अदालत ने 16 फरवरी को कहा था कि इस मामले में अंतिम सुनवाई सात अप्रैल से शुरू होगी, जिसके 22 अप्रैल तक पूरी होने की संभावना है।Delhi: 

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