शरजील इमाम ने यूएपीए मामले में जमानत के लिए उच्च न्यायालय का किया रुख, जानिए पूरा मामला

Delhi Riots Case:

Delhi Riots Case: छात्र कार्यकर्ता शरजील इमाम ने गुरुवार को यूएपीए मामले में जमानत के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख किया।उन्होंने दिल्ली में फरवरी 2020 में हुए दंगों के पीछे की ‘बड़ी साजिश’ के संबंध में आतंकवाद-रोधी कानून यूएपीए के तहत दर्ज मामले में जमानत प्रदान करने का अनुरोध किया है।इमाम की अपील शुक्रवार को न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह और न्यायमूर्ति विकास महाजन की पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध की गई।इसमें अधीनस्थ अदालत के चार जुलाई के उस फैसले को चुनौती दी गई है जिसमें उनकी दूसरी नियमित जमानत अर्जी खारिज कर दी गई थी। Delhi Riots Case:

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इमाम को 25 अगस्त, 2020 को गिरफ्तार किया गया था और उन पर गैर-कानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत मामला दर्ज किया गया था।उन पर आरोप है कि वे उत्तर-पूर्वी दिल्ली में फरवरी 2020 में हुए दंगों के सूत्रधारों में से एक है। इन दंगों में 53 लोगों की मौत हुई थी और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे।ये हिंसा नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 और राष्ट्रीय नागरिक पंजी(एनआरसी) के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों के दौरान भड़की थी। Delhi Riots Case:

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अधीनस्थ अदालत ने चार जुलाई को इमाम की जमानत याचिका खारिज कर दी और कहा कि उनके पास सर्वोच्च न्यायालय के पांच जनवरी के आदेश का पालन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है, इसलिए वे न तो याचिका पर विचार कर सकती है और न ही उसे जमानत दे सकती है।निचली अदालत ने कहा कि जमानत याचिका उनके समक्ष सुनवाई योग्य ही नहीं है।उच्च न्यायालय में अपनी अपील में इमाम ने कहा कि निचली अदालत ने उनकी नियमित जमानत याचिका की स्वतंत्र रूप से समीक्षा करने से इनकार करके गलती की है। Delhi Riots Case:

याचिका में कहा गया है कि छह साल बीत जाने के बाद भी निचली अदालत में कार्रवाई आरोप पर बहस के चरण से आगे नहीं बढ़ी है।उच्चतम न्यायालय ने पांच जनवरी को उमर खालिद और इमाम को ‘षड्यंत्र के बड़े मामले’ में जमानत देने से इनकार कर दिया, जबकि सह-आरोपी गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को राहत प्रदान कर दी।न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति एन वी अंजारिया की पीठ ने तब टिप्पणी की कि खालिद और इमाम के खिलाफ यूएपीए के तहत प्रथम दृष्टया मामला बनता है और ये माना कि ‘भागीदारी के स्तर’ को देखते हुए सभी आरोपियों के साथ समान व्यवहार नहीं किया जा सकता।

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