Delhi: अमेरिका ने भारत को रूस से कच्चा तेल खरीदने के लिए 30 दिनों की अस्थायी छूट दे दी है। लेकिन इस बयान में इस्तेमाल शब्द “allow” और “permit” ने देश में राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है। अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा – “ट्रेजरी डिपार्टमेंट भारत के रिफाइनर्स को रूसी तेल खरीदने की 30 दिनों की अस्थायी वेवर जारी कर रहा है, ताकि वैश्विक बाजार में तेल का प्रवाह जारी रहे। यह सिर्फ समुद्र में फंसे तेल के लेन-देन के लिए है और रूसी सरकार को बड़ा फायदा नहीं होगा।”
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यह फैसला ऐसे समय आया है जब ईरान युद्ध के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य में शिपिंग बाधित हो गई है, जिससे मिडिल ईस्ट से भारत की तेल आपूर्ति पर खतरा मंडरा रहा है। भारत अपनी 40-50% तेल जरूरतें मिडिल ईस्ट से पूरी करता है। लेकिन क्या भारत जैसा संप्रभु राष्ट्र अमेरिका से “इजाजत” मांगता है? इस बयान पर विपक्ष ने केंद्र सरकार पर जमकर हमला बोला है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने तंज कसते हुए कहा – “अमेरिका भारत को रूस से तेल खरीदने की ‘इजाजत’ दे रहा है? इजाजत? सबसे पहले तो तुम होते कौन हो इजाजत देने वाले? हम संप्रभु राष्ट्र हैं, किसी की गुलाम नहीं।” कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने इसे “भारत की संप्रभुता पर हमला” करार दिया और कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार अमेरिकी दबाव में देश की स्वतंत्र विदेश नीति को कमजोर कर रही है।
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वहीं, बीजेपी और सरकार के सूत्रों का कहना है कि यह सिर्फ एक अस्थायी तकनीकी राहत है, ताकि पेट्रोल-डीजल के दाम न बढ़ें और ऊर्जा संकट न आए। भारत पहले से रूस से तेल खरीद रहा था और अपनी जरूरतों के हिसाब से फैसला लेगा।सरकारी सूत्रों ने बताया कि एनर्जी सिक्योरिटी में भारत बहुत अच्छी स्थिति में है।स्टॉक की मौजूदा स्थिति अच्छी है।स्टॉक हर दिन भरा जा रहा है।LPG या LNG की कोई कमी नहीं है।दुनिया में क्रूड ऑयल की कोई कमी नहीं है।भारत दूसरे सप्लायर्स के भी संपर्क में है।ऑस्ट्रेलिया और कनाडा ने भी भारत को गैस बेचने का ऑफर दिया है,भारत दूसरे सोर्स भी ढूंढ रहा है।वही विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी वेवर पेट्रोल-डीजल की कीमतों में उछाल को रोकने में मदद करेगा, क्योंकि ब्रेंट क्रूड पहले ही 87 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुका है। लेकिन राजनीतिक रूप से यह मुद्दा गरमाता जा रहा है,क्या यह अमेरिका का U-टर्न है या भारत पर दबाव की नई रणनीति? क्या भारत अब अमेरिकी तेल ज्यादा खरीदेगा? इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में मिलेंगे।
