उत्तर प्रदेश विधान भवन, लखनऊ में 19 से 21 जनवरी, 2026 तक आयोजित 86वाँ अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन (AIPOC) आज लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के समापन भाषण के साथ सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। इसके साथ ही सम्मेलन के समापन सत्र में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, राज्य सभा के उपसभापति, उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सभापति एवं उत्तर प्रदेश विधान सभा के अध्यक्ष ने अपने विचार व्यक्त किए।
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अपने समापन भाषण में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि विधायिका को अधिक प्रभावी, जनोपयोगी और उत्तरदायी बनाने के लिए एक ‘राष्ट्रीय विधायी सूचकांक’ (National Legislative Index) तैयार किया जाएगा, जिससे देशभर के विधानमंडलों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा, संवाद की गुणवत्ता और कार्यकुशलता में वृद्धि हो सके। उन्होंने इस संबंध में एक समिति के गठन की जानकारी भी दी।
ओम बिरला ने कहा कि राज्य विधान मंडलों में प्रति वर्ष न्यूनतम 30 बैठकें सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि विधानमंडल जनता की अपेक्षाओं और आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति का एक प्रभावी मंच बन सकें। उन्होंने कहा कि सदन जितना अधिक चलेगा, उतनी ही अधिक सार्थक, गंभीर और परिणामोन्मुख चर्चा संभव होगी।
लोकसभा अध्यक्ष ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को भी संबोधित किया। आगामी बजट सत्र के दौरान सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से चलाने के बारे में सवाल का जवाब देते हुए, लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि सदन में लगातार नियोजित गतिरोध और व्यवधान देश के लोकतंत्र के लिए उचित नहीं हैं। जब सदन में व्यवधान होता है, तो सबसे अधिक नुकसान उस नागरिक का होता है जिसकी समस्या पर चर्चा होनी थी। बिरला ने कहा कि हमें Disruption नहीं, बल्कि Discussion और Dialogue की संस्कृति को सुदृढ़ करना होगा।
ओम बिरला ने सभी दलों के नेताओं व सदस्यों से सदन को सुचारू रूप से चलाने में सहयोग देने की अपील की और कहा कि लोकतंत्र में लोक सर्वोपरि है, और जनता के प्रति हमारी जवाबदेही केवल चुनाव के समय नहीं, बल्कि हर दिन और हर क्षण है।
लोकसभा अध्यक्ष बिरला ने कहा कि पीठासीन अधिकारी केवल कार्यवाही संचालित करने वाले नहीं होते, बल्कि वे संविधान के प्रहरी और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के संरक्षक होते हैं। उनकी निष्पक्षता, संवेदनशीलता और दृढ़ता ही सदन की दिशा तय करती है।
86वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन में कुल छह महत्वपूर्ण संकल्प पारित किए गए:
संकल्प संख्या 1 – सभी पीठासीन अधिकारी अपनी-अपनी विधायिकाओं के कार्य संचालन के प्रति स्वयं को पुनः समर्पित करेंगे, ताकि वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ के राष्ट्रीय लक्ष्य की प्राप्ति में योगदान दिया जा सके।
संकल्प संख्या 2 – सभी राजनीतिक दलों के बीच सहमति बनाकर राज्य विधायी निकायों की न्यूनतम तीस (30) बैठकें प्रति वर्ष की जाएँ तथा विधायी कार्यों के लिए उपलब्ध समय और संसाधनों का रचनात्मक एवं प्रभावी उपयोग किया जाए, ताकि लोकतांत्रिक संस्थाएं जनता के प्रति उत्तरदायी हो सकें।
संकल्प संख्या 3 – विधायी कार्यों की सुगमता बढ़ाने के लिए प्रौद्योगिकी के उपयोग को निरंतर सुदृढ़ किया जाएगा, जिससे जनता और उनकी विधायिकाओं के बीच प्रभावी संपर्क स्थापित हो सके तथा सार्थक सहभागी शासन सुनिश्चित किया जा सके।
संकल्प संख्या 4 – सहभागी शासन की सभी संस्थाओं को आदर्श नेतृत्व प्रदान करना निरंतर जारी रखना, ताकि राष्ट्र की लोकतांत्रिक परंपराएँ और मूल्य और अधिक गहरे तथा सशक्त बन सकें।
संकल्प संख्या 5 – डिजिटल प्रौद्योगिकी के कुशल उपयोग के क्षेत्र में सांसदों एवं विधायकों की क्षमता निर्माण का निरंतर समर्थन तथा विधायिकाओं में होने वाली बहसों और चर्चाओं में जनप्रतिनिधियों की प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु शोध एवं अनुसंधान सहायता को सुदृढ़ करना।
संकल्प संख्या 6 – विधायी निकायों के कार्य संपादन का वस्तुनिष्ठ मानकों के आधार पर मूल्यांकन एवं तुलनात्मक आकलन (बेंचमार्किंग) करने हेतु एक ‘राष्ट्रीय विधायी सूचकांक’ (National Legislative Index) का निर्माण, जिससे जनहित में अधिक उत्तरदायित्व के साथ स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करने हेतु अनुकूल वातावरण स्थापित हो सके।
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तीन दिवसीय सम्मेलन के पूर्ण सत्रों में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की उपस्थिति में तीन प्रमुख विषयों पर चर्चा हुई।
• पारदर्शी, कुशल एवं नागरिक-केंद्रित विधायी प्रक्रियाओं हेतु प्रौद्योगिकी का उपयोग,
• विधायकों की क्षमता-वृद्धि द्वारा कार्यकुशलता में सुधार एवं लोकतांत्रिक शासन को सुदृढ़ करना, तथा
• जनता के प्रति विधायिकाओं की जवाबदेही।
इस सम्मेलन में देश के 24 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों से 36 पीठासीन अधिकारियों ने भागीदारी की। इस प्रकार सहभागिता की दृष्टि से 86वाँ AIPOC अब तक का सबसे बड़ा सम्मेलन रहा। लोक सभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन जैसे मंच लोकतांत्रिक संस्थाओं के बीच सहयोग को बढ़ाते हैं, आपसी समन्वय को मजबूत करते हैं और शासन व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने में सहायक सिद्ध होते हैं।
ओम बिरला ने सम्मेलन के सफल आयोजन के लिए उत्तर प्रदेश सरकार, उत्तर प्रदेश विधान सभा, विधान परिषद, लोक सभा एवं राज्य सभा सचिवालय, तथा सभी प्रतिभागी पीठासीन अधिकारियों और प्रतिनिधियों का आभार व्यक्त किया। 86वाँ अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन (AIPOC) भारतीय संसदीय लोकतंत्र को अधिक सुदृढ़, उत्तरदायी और जन-केंद्रित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि सिद्ध हुआ है।
