नई खोज! बुध पर मिले हीरों से क्या पृथ्वी वासियों को मिलेगा लाभ ?

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Research on Mercury: हमारा अंतरिक्ष कई सारे रहस्यों और जानकारी को समेटे हुए है। जब भी जानकारी के प्रमाण की खोज की जाती है तब एक नया और चौंकाने वाला रहस्य सामने आता है। इन रहस्यों से निपटने के लिए वैज्ञानिक निरंतर मेहनत करते रहते हैं। इस बार भी अंतरिक्ष से एक नई खोज निकलकर सामने आई है, जिसे जानकर लोगों के साथ-साथ वैज्ञानिकों ने भी दांतो तले ऊंगली दबा ली है।

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दरअसल, एक शोध में सामने आया है कि बुध ग्रह पर काफी अधिक मात्रा में हीरे मौजूद हैं। वैज्ञानिकों का दावा है कि इस ग्रह के नीचे हीरे की एक मोटी परत मौजूद है। वैज्ञानिकों का मानना है कि हीरे बनने का कारण बुध की चुंबकीय शक्ति है। हालांकि यह शक्ति पृथ्वी के मुकाबले काफी कमजोर है। नासा ने अंतरिक्ष में अपने मैसेंजर को भेजकर एक शोध किया था, जिसमें बुध की सतह पर काले क्षेत्रों की खोज की गई, जिसे ग्रेफाइट का नाम दिया गया। आइए जानते हैं कि वहां हीरे बनने का कारण क्या है?

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कैसे बने होंगे हीरे? वैज्ञानिकों का काफी समय से मानना है कि मेंटल में तापमान और दबाव का होना जरूरी है, जो कार्बन के लिए सही रहता है। इसकी वजह से ग्रेफाइट का निर्माण भी होता है। असल में मेंटल एक तरह की परत होती है, जो सबसे मोटी और बड़ी परत होती है। यह चट्टान या बर्फ से बनी हुई होती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्रेफाइट मेंटल से हल्का होता है, जिसके चलते वह इसकी सतह पर तैरता है।

बुध के मेंटल में बदलाव देखने को मिला था। 2019 की एक रिसर्च में यह पाया गया की बुध का मेंटल पहले की तुलना में 80 किलोमीटर तक गहरा होता जा रहा है। जिसकी वजह से मेंटल कोर सीमा में तापमान और दबाव में वृद्धि हो सकती है। ऐसा अंदेशा लगाया जा रहा है कि तापमान और दबाव बढ़ने की वजह से ही कार्बन हीरे के क्रिस्टल में बदल गया होगा। रिसर्चर्स के द्वारा तैयार की गईं परिस्थितियां इस पूरे मामले को सही से समझने के लिए बेल्जियम और चीन के रिसर्चर्स की टीम ने ऐसी स्थिती बनाने की सोची, जिसमें कार्बन, सिलिका और लोहे का एक मिश्रण तैयार किया गया।

उसमें अलग-अलग मात्रा में आयरन सल्फाइड मिलाया गया। इसके बाद इसे 7 गीगा पास्कल का दबाव दिया गया। शोध में देखा गया कि यह केमिकल सॉल्यूशन सल्फर मिलाने पर ज्यादा जमता है और ऐसी ही परिस्थिती में हीरे बनने की संभावना होती है। हालांकि वैज्ञानिकों ने बताया कि हीरे की मौजूदगी के बाद भी वहां से हीरे निकालना आसान नहीं है क्योंकि ग्रह का तापमान उच्च होने के साथ हीरे सतह से लगभग 485 किमी नीचे स्थित है, जिसे निकाल पाना संभव नहीं है।

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