एकादशी और मकर संक्रांति के शुभ अवसर पर देशभर में लाखों श्रद्धालुओं ने बुधवार सुबह कड़ाके की ठंड के बावजूद गंगा समेत अन्य पवित्र नदियों में आस्था की डुबकी लगाई है। प्रयागराज संगम घाट, वाराणसी, हरिद्वार समेत अन्य कई प्रसिद्ध घाटों पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिली।
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प्रयागराज में संगम पर आस्था का अद्भुत नजारा देखने को मिला। यहां चल रहे माघ मेले के दूसरे और अहम स्नान के लिए लाखों श्रद्धालु इकट्ठा हुए। अधिकारियों ने सभी श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए व्यापक सुरक्षा इंतजाम किए हैं। श्रद्धालुओं ने इंतजामों की तारीफ करते हुए, माघ मेले की तैयारियों की तुलना कुंभ मेले से की।
इसके दूसरी तरफ शंखों की आवाज के बीच हजारों श्रद्धालुओं ने वाराणसी के प्राचीन घाटों पर भी पवित्र स्नान किया। वहीं अयोध्या में भी श्रद्धालुओं ने शहर के मंदिरों में पूजा-अर्चना करने से पहले सरयू नदी में पवित्र स्नान किया। इसके साथ ही हरिद्वार में हर की पौड़ी पर भी हजारों लोगों ने कड़ाके की ठंड के बीच गंगा में पवित्र डुबकी लगाई।
एकादशी और मकर संक्रांति पर्व के शुभ अवसर पर मध्य प्रदेश के जबलपुर में श्रद्धालुओं ने नर्मदा नदी के किनारे ग्वारीघाट पर पवित्र स्नान किया। फिर पूजा-अर्चना कर दान-पुण्य के काम किए। वहीं पश्चिम बंगाल में दक्षिण 24 परगना के गंगासागर में, गंगा और बंगाल की खाड़ी के संगम पर पवित्र डुबकी लगाने के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ रही।
मकर संक्रांति मुख्य रूप से फसलों का त्योहार है, जिसे पूरे भारत में अलग-अलग नामों और अनोखे क्षेत्रीय रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। तमिलनाडु में इसे पोंगल के रूप में मनाया जाता है। यहां ये चार दिनों का त्योहार होता है, जिसमें नई फसल के चावल से खास पकवान बनाए जाते हैं। गुजरात में इसे उत्तरायण के नाम से जाना जाता है, जब आसमान पतंगों से भर जाता है और परिवार दावत और मौज-मस्ती के लिए एक साथ होते हैं। असम में इसे माघ बिहू के रूप में मनाया जाता है – जिसमें लोग मिल जुलकर दावतें देते हैं और अलाव जलाए जाते हैं। ये आमतौर पर हर साल 14 जनवरी को पड़ता है, मगर इस बार इस पर्व को अधिकतर लोग 15 जनवरी को मना रहे हैं। माना जाता है कि संक्रांति के बाद सर्दी धीरे धीरे कम हो जाती है और दिन लंबे होने लगते हैं।
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15 जनवरी को क्यों मनाया जा रहा है मकर संक्रांति पर्व ?-जानिए
एकादशी का संयोग: इस वर्ष 14 जनवरी को षटतिला एकादशी भी है। एकादशी के दिन चावल या खिचड़ी का सेवन वर्जित होता है, जबकि संक्रांति पर खिचड़ी खाने की परंपरा है। इस धार्मिक उलझन से बचने के लिए भी कई लोग 15 जनवरी को संक्रांति मनाना पसंद कर रहे हैं।
उदया तिथि का महत्व: हिंदू धर्म में किसी भी पर्व का निर्धारण सूर्योदय के समय मौजूद तिथि (उदया तिथि) के आधार पर किया जाता है। 2026 में सूर्य 14 जनवरी की रात (लगभग 9:39 PM) मकर राशि में प्रवेश कर रहा है, इसलिए अगले दिन 15 जनवरी को उदया तिथि के अनुसार पर्व मनाया जा रहा है।
पुण्य काल का समय: ज्योतिष गणना के अनुसार, संक्रांति का पुण्य काल सूर्य के राशि परिवर्तन के 16 घंटे तक रहता है। 14 जनवरी की रात को गोचर होने के कारण यह शुभ समय 15 जनवरी की दोपहर (लगभग 1:39 PM) तक प्रभावी रहेगा, जिससे दान-पुण्य और स्नान के लिए 15 जनवरी का दिन अधिक श्रेष्ठ माना गया है।
