Indra Ekadashi: पितरों का उद्धार और वैकुंठ की प्राप्ति के लिए क्यों खास है आज की ‘इंद्रा एकादशी’?

Indra Ekadashi

Indra Ekadashi: आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी यानी इंद्रा एकादशी (Indira Ekadashi) है। यह एकादशी पितृ पक्ष (श्राद्ध पक्ष) के दौरान आती है, इसलिए सनातन धर्म में इसका विशेष और अद्वितीय स्थान है। पितरों को मोक्ष और वंश को समृद्धि दिलाने वाली पावन ‘इंद्रा एकादशी’ आज।  Indra Ekadashi

पितृ पक्ष के दौरान पड़ने वाली इंद्रा एकादशी का व्रत आज पूरे देश में श्रद्धा और नियम-संयम के साथ रखा जा रहा है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, साल की सभी 24 एकादशियों में से इंद्रा एकादशी का व्रत ही एक ऐसा व्रत है, जिसका पुण्य फल इंसान न केवल स्वयं के लिए अर्जित करता है, बल्कि अपने दिवंगत पूर्वजों (पितरों) को भी समर्पित कर सकता है।

मान्यता है कि यदि कोई पूर्वज जाने-अनजाने हुए पापों के कारण यमलोक या निम्न योनि में कष्ट भोग रहे हों, तो इस दिन विधि-विधान से व्रत रखकर उसका फल पितरों के नाम दान करने से उन्हें यमलोक के कष्टों से मुक्ति मिलती है और वैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है। Indra Ekadashi

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इंद्रा एकादशी क्यों आती है ?

महाभारत और पद्म पुराण के अनुसार, महिष्मति नगरी के धर्मप्रिय राजा इंद्रसेन के दरबार में एक दिन देवर्षि नारद पधारे। नारद जी ने राजा को बताया कि वे यमलोक गए थे, जहाँ उन्होंने राजा इंद्रसेन के दिवंगत पिता को देखा। पूर्व जन्म में किसी भूल के कारण उनके पिता यमलोक में कष्ट भोग रहे थे।

नारद जी ने राजा को आश्विन कृष्ण एकादशी (इंद्रा एकादशी) का व्रत रखने और उसका पुण्य फल अपने पिता को दान करने की सलाह दी। राजा इंद्रसेन ने पूर्ण विधि-विधान के साथ यह व्रत रखा और उसका फल अपने पिता को अर्पित किया। इसके प्रभाव से उनके पिता के सभी पाप कट गए और वे तुरंत गरुड़ पर सवार होकर वैकुंठ लोक चले गए। तभी से इस एकादशी का नाम ‘इंद्रा एकादशी’ पड़ा और पितरों के उद्धार के लिए यह व्रत रखा जाने लगा।

इंद्रा एकादशी का क्या है महत्व:- Indra Ekadashi

  • पितृ दोष से मुक्ति: यह व्रत पितृ पक्ष में आने के कारण पितृ दोष के शमन और पूर्वजों के आशीर्वाद प्राप्ति का सबसे बड़ा साधन है।

  • मोक्ष की प्राप्ति: इस दिन भगवान विष्णु (शालिग्राम रूप) की पूजा करने से व्रती और उसके पितृ दोनों को मोक्ष मिलता है।

  • पापों का नाश: जाने-अनजाने में किए गए शारीरिक, मानसिक या वाचिक पापों का शमन होता है।

बात करें आज के दिन क्या करना और क्या नहीं तो इसका खास ध्यान रखना चाहिए। कुछ भी ऐसा ना करें जिससे व्रत का फल खंडित हो। आइए जानते कि इंद्रा एकादशी के दिन क्या करें और क्या नहीं ।

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आज के दिन क्या करेंछ-

  • विष्णु पूजा व शालिग्राम अभिषेक: भगवान विष्णु या शालिग्राम जी को पंचामृत व गंगाजल से स्नान कराएं, पीला चंदन, पीले फूल और तुलसीदल अर्पित करें।

  • पितृ तर्पण व दान: मध्याह्न (दोपहर) के समय पितरों के नाम से जल में तिल मिलाकर तर्पण करें। जरूरतमंदों या ब्राह्मणों को अन्न, वस्त्र व तिल का दान दें। Indra Ekadashi

  • पञ्चबलि भोग: भोजन पकाकर उसका एक हिस्सा गाय, कुत्ते, कौए, चींटी और देवों के लिए अवश्य निकालें।

  • भगवद् चिंतन व भजन: दिनभर ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जप करें और रात्रि में जागरण कर विष्णु सहस्रनाम या गीता का पाठ करें।

  • पारण समय: व्रत का पारण अगले दिन (07 अक्टूबर) सूर्योदय के बाद द्वादशी तिथि में सात्विक भोजन से करें।

 आज क्या न करें-

  • चावल का सेवन न करें: एकादशी के दिन चावल खाना सख्त वर्जित माना गया है।

  • तुलसी के पत्ते न तोड़ें: एकादशी के दिन तुलसी पत्र तोड़ना वर्जित है। (पूजा के लिए एक दिन पहले तोड़े गए पत्ते ही प्रयोग करें)।

  • तामसिक भोजन व नशा: लहसुन, प्याज, मांस, मदिरा और मसूर की दाल का प्रयोग भूलकर भी न करें। Indra Ekadashi

  • क्रोध व कलह: किसी की निंदा न करें, किसी पर गुस्सा न करें और घर में शांति का माहौल बनाए रखें।

  • शारीरिक संपर्क व आलस्य: दिन के समय सोने से बचें और ब्रह्मचर्य का पालन करें।

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