निजी क्षेत्र को केवल आर्थिक भागीदार नहीं, बल्कि भारत के भविष्य का सह-निर्माता बनकर उभरना होगा – उपराष्ट्रपति

Vice President: उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने आज भारत मंडपम, नई दिल्ली में आयोजित CII-ITC सस्टेनेबिलिटी अवार्ड्स के 19वें संस्करण में मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए कहा, कि “उद्योग को समावेशन की शक्ति बनना चाहिए — सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) को समर्थन देने, और नेतृत्व में लैंगिक तथा जातीय विविधता को प्रोत्साहन देने के माध्यम से। यह कहने में आसान है, पर करने में कठिन। हमें लैंगिक और जातीय विविधता को सही मायनों में समझना होगा। जहां तक लैंगिक समानता का प्रश्न है, हम सकारात्मक कार्रवाई (affirmative action) की बात करते हैं, लेकिन असली समस्या तब आती है जब लैंगिक भेदभाव सूक्ष्म होता है—जब इसे शब्दों में नहीं समझाया जा सकता, बल्कि यह स्वाभाविक रूप से वर्चस्व जताने की प्रवृत्ति में प्रकट होता है।”उद्योग की भूमिका पर बल देते हुए उन्होंने कहा, “निजी क्षेत्र को केवल आर्थिक गतिविधियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि भारत के भविष्य का सह-निर्माता बनकर काम करना चाहिए। हम केवल लाभ के लिए काम नहीं करते; हम अपने सामूहिक ऊर्जा को समाज की भलाई के लिए लगाने में विश्वास करते हैं। एक सच्चे विकसित राष्ट्र में अवसर केवल कुछ लोगों का विशेषाधिकार नहीं बल्कि सभी का अधिकार होता है।”

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भारत के सतत विकास के दृष्टिकोण पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा, “भारत मानवता का छठा हिस्सा है। हम दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं और एक ऐसे विकास मॉडल के वाहक हैं जो अर्थव्यवस्था, पारिस्थितिकी और नैतिकता को संतुलित करता है। वैश्विक 2030 सतत विकास एजेंडा भारत की सक्रिय भागीदारी के बिना सफल नहीं हो सकता। सौभाग्यवश, भारत की नेतृत्व दृष्टि ने इस जिम्मेदारी को स्पष्टता और दृढ़ संकल्प के साथ अपनाया है। हम उद्देश्य के साथ समृद्धि, समावेशन के साथ विकास, और ईमानदारी के साथ नवाचार चाहते हैं। भारतीय उद्योग को इस हरित क्रांति का अग्रदूत बनना चाहिए—नवीकरणीय ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन, परिपत्र अर्थव्यवस्था मॉडल, और कार्बन बाजारों में निवेश करें। अगर हम सततता को केवल अनुपालन के रूप में देखें, तो हम यह लड़ाई पहले ही हार चुके होंगे।उद्योगपतियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, “भारतीय उद्योग को अब न केवल वैश्विक बाजारों में बल्कि विचारों, मानकों और समाधानों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करानी चाहिए। ‘ब्रांड इंडिया’ को चार स्तंभों—गुणवत्ता, भरोसा, नवाचार, और आधुनिकता में पुनर्परिभाषित प्राचीन ज्ञान—पर निर्मित करें। ग्रीनफील्ड परियोजनाओं की ओर अग्रसर हों। स्वास्थ्य, शिक्षा और महानगरों में सुविधाएं बढ़ाना महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे संतुलित क्षेत्रीय विकास नहीं होता। इसलिए अगर कॉर्पोरेट क्षेत्र अपने CSR फंड्स को स्वयं उपयोग करें, तो जिन क्षेत्रों को अब तक अनदेखा किया गया है, वहाँ भी विश्वस्तरीय संस्थान उभर सकते हैं।”
उपराष्ट्रपति ने आगे कहा, “एक समय था जब स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्र को व्यवसायियों द्वारा समाज को वापस देने का माध्यम माना जाता था। लेकिन अब ये क्षेत्र लाभ का साधन बनते जा रहे हैं। इन क्षेत्रों का व्यवसायीकरण और वस्तुवादीकरण, जो समाज सेवा के माध्यम होने चाहिए थे, चिंता का विषय है। इसलिए मैं चाहता हूँ कि CII एक ऐसी व्यावसायिक संस्कृति को बढ़ावा दे जो समता, पारदर्शिता और दीर्घकालिक मूल्य निर्माण को प्राथमिकता दे।निजी क्षेत्र की भूमिका पर बल देते हुए उन्होंने कहा, “सरकार की भूमिका केवल एक सक्षमकर्ता की है। असली ज़िम्मेदारी कॉर्पोरेट क्षेत्र पर है। सरकार अकेले ‘पेनल्टी गोल’ नहीं कर सकती, न ही वह अकेले ‘कॉर्नर किक’ को गोल में बदल सकती है। नवाचार, रोजगार सृजन और राष्ट्रीय विकास की संरचना में उद्योग की निर्णायक भूमिका है। जब मैं वैश्विक दृष्टिकोण से कॉर्पोरेट भारत को देखता हूं, तो यह प्रतिभा का अनमोल भंडार और समाज के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक है। इसका सरकार के साथ समन्वय एक अभूतपूर्व परिवर्तन ला सकता है।उपराष्ट्रपति ने कहा, “भारत सरकार अब केवल ‘सरकार केंद्रित दृष्टिकोण’ से आगे बढ़ चुकी है। अब ‘समाज समग्र दृष्टिकोण’ अपनाया गया है, जिसमें राज्य सरकारें, स्थानीय निकाय, सिविल सोसायटी, निजी क्षेत्र और समुदाय सभी महत्वपूर्ण कड़ी हैं। लेकिन इस प्रगति के इंजन को सभी सिलिंडरों पर चलाना होगा, तभी हम वास्तविक सफलता प्राप्त कर सकते हैं।”
भारतीय अर्थव्यवस्था की संभावनाओं पर बोलते हुए उन्होंने कहा, “भारत केवल पाँच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की आकांक्षा नहीं रखता—बल्कि वह एक भरोसेमंद अर्थव्यवस्था, वैश्विक मूल्य श्रृंखला में विश्वसनीय भागीदार, और अस्थिर दुनिया में एक स्थिर स्तंभ बनने के रास्ते पर अग्रसर है। जब वैश्विक परिदृश्य में उथल-पुथल है, आपूर्ति श्रृंखलाएं बाधित हैं—तब भारत एक सशक्त और स्थिर आवाज बनकर उभर रहा है।”उपराष्ट्रपति ने उद्योग को अनुसंधान और विकास में अग्रणी भूमिका निभाने का आग्रह करते हुए कहा, “उद्योग को अनुसंधान और नवाचार में नेतृत्व लेना चाहिए। शोध केवल संग्रह या सतही जानकारी का संकलन नहीं होना चाहिए। शोध को ज़मीन पर बदलाव लाने से जुड़ना चाहिए। ‘सेल्फ के लिए नहीं, शेल्फ के लिए नहीं’—शोध का उद्देश्य सामाजिक प्रभाव होना चाहिए।”युवा पीढ़ी और कौशल विकास पर बल देते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा, “हमारी लगभग दो-तिहाई आबादी 35 वर्ष से कम उम्र की है। भारत की औसत आयु 28 वर्ष है, जो कि चीन और अमेरिका से 10 वर्ष कम है। यह जनसांख्यिकीय लाभांश हमारा सबसे बड़ा पूंजी है। इस पूंजी को सही दिशा में लगाने की ज़िम्मेदारी खासतौर पर कॉर्पोरेट क्षेत्र की है। सरकार नवाचारपूर्ण पहलों के माध्यम से अपना कार्य कर रही है, लेकिन इस परिवर्तन को प्रभावी ढंग से साकार करने की जिम्मेदारी उद्योग जगत की है। मैं उद्योग से आग्रह करता हूं कि वह शैक्षणिक संस्थानों, प्रशिक्षण केंद्रों और सरकार के साथ मिलकर भविष्योन्मुख पाठ्यक्रम तैयार करे।”

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