Supreme Court News: उच्चतम न्यायालय ने 1989 के दंगा और स्वेच्छा से चोट पहुंचाने के मामले में एक पुलिस अधिकारी के खिलाफ कार्यवाही पर रोक लगा दी और कहा कि 35 वर्षों में अभियोजन पक्ष के किसी भी गवाह से पूछताछ नहीं हुई।शीर्ष अदालत ने कहा कि वह केवल देरी के आधार पर कार्यवाही को रद्द करने के पक्ष में है लेकिन आगे बढ़ने से पहले वह राज्य की दलील सुनना चाहेगा।
न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने से इनकार करने के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली पुलिस अधिकारी की याचिका पर उत्तराखंड सरकार को नोटिस जारी किया।Supreme Court News Supreme Court News Supreme Court NewsSupreme Court News
Read also- Delhi: देश का विदेशी मुद्रा भंडार 2.36 अरब डॉलर बढ़कर 703.30 अरब डॉलर पर पहुंचा
पीठ ने कहा कि हमें सूचित किया गया है कि कुल पांच आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र दायर किए गए थे, जिनमें वर्तमान याचिकाकर्ता भी शामिल है। इन पांचों में से दो सह-आरोपियों का निधन हो गया है और अन्य दो सह-आरोपियों को पहले ही बरी कर दिया गया है क्योंकि अभियोजन पक्ष मौखिक साक्ष्य दर्ज करने के उद्देश्य से किसी भी गवाह को पेश करने में विफल रहा। पीठ ने कहा कि इस मामले के तथ्यों और परिस्थितियों विशेष रूप से इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि लगभग 35 वर्ष बीत चुके हैं, हम केवल इसी आधार पर कार्यवाही को रद्द करने के पक्ष में हैं।
Read also- Chhattisgarh: बंदूकधारी हमलावर ने घर में घुसकर कांग्रेस नेता के बेटे को उतारा मौत के घाट , दूसरा बेटा हुआ घायल
शीर्ष अदालत कैलाश चंद्र कापरी द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें 35 साल की ‘‘असामान्य’’ देरी पर चिंता व्यक्त की गई थी और आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने से इलाहाबाद उच्च न्यायालय के इनकार को चुनौती दी गई थी।प्रयागराज के जीआरपी रामबाग थाने में 1989 में दर्ज प्राथमिकी के संबंध में कापरी पर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 147 (दंगा), 323 (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना) और 504 (शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमान करना) के साथ-साथ रेलवे अधिनियम की धारा 120 के तहत मुकदमा चल रहा है।शीर्ष अदालत ने इस मामले की सुनवाई 29 अप्रैल को तय की है।Supreme Court News
