Delhi: इस साल सर्दियों के मौसम से पहले दिल्ली की हवा की गुणवत्ता खराब हो रही है। हाल ही में एक्यूआई यानी एयर क्वालिटी इंडेक्स ‘खराब’ श्रेणी में दर्ज किया गया है। ऐसे हालात को देखते हुए, ‘सेंटर फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट’ ने राष्ट्रीय राजधानी में ग्रैप यानी ‘ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान’ के पहले चरण को लागू कर दिया है।Delhi
साथ ही, दिल्ली सरकार इस संकट से निपटने के लिए विशेषज्ञों के साथ लगातार बैठकें कर रही है। शहर की हवा बद से बदतर होती जा रही है। ऐसे में विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि आने वाले हफ्तों में प्रदूषण का स्तर और बढ़ सकता है। जानकारों का कहना है कि सिर्फ आपातकालीन उपायों से इस बार-बार आने वाले संकट को हल नहीं किया जा सकता। उनका मानना है कि वाहनों, औद्योगिक उत्सर्जन, बिजली संयंत्रों से होने वाले प्रदूषण और गैसीय प्रदूषकों के खिलाफ लगातार और सख्त कार्रवाई किए जाने की जरूरत है।Delhi
पर्यावरण कार्यकर्ता और स्वच्छ हवा की पैरोकार भावरीन कंधारी बताती हैं कि हाल ही में प्रदूषण नियंत्रण पर हुई एक समीक्षा बैठक में, दक्षिण-पश्चिम दिल्ली और पश्चिम दिल्ली को प्रदूषण के प्रमुख हॉटस्पॉट्स यानी इलाकों के रूप में पहचाना गया है। उन्होंने अधिकारियों से अपील की है कि वे प्रदूषण के स्रोतों के खिलाफ कार्रवाई करें और जहां भी नियमों का उल्लंघन पाया जाए, वहां बिना किसी ढिलाई के सख्त कानूनी कदम उठाए जाएं।Delhi
पर्यावरण कार्यकर्ता जय धर गुप्ता सवाल उठाते हैं कि आखिर दिल्ली में प्रदूषण के लिए मुख्य तौर पर जिम्मेदारी पड़ोसी राज्यों के सिर क्यों मढ़ी जाती है?उनका मानना है कि सर्दियों के महीनों में दिल्ली की खराब वायु गुणवत्ता के लिए किसी एक ही वजह को जिम्मेदार ठहराना गलत है। उन्होंने हवा की गुणवत्ता की निगरानी करने वाले डेटा की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए हैं। उनका दावा है कि कई निगरानी केंद्र प्रदूषण वाले मुख्य इलाकों को ठीक से कवर नहीं कर रहे हैं।
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नवंबर में प्रदूषण का स्तर और बढ़ने की आशंका है। ऐसे में यह देखना होगा कि क्या ईंधन भरने से पहले ‘प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र’ यानी पीयूसी की अनिवार्यता को सख्ती से लागू करने, कोयला और लकड़ी जलाने पर रोक लगाने, और ‘वर्क-फ्रॉम-होम’ की व्यवस्था को बढ़ावा देने जैसे उपाय कारगर साबित होते हैं या नहीं। जानकार इस बात पर जोर देते हैं कि प्रदूषण कम करने के लिए दिल्ली में प्रदूषण फैलाने वाले मुख्य स्रोतों से निपटने के लिए साल भर लगातार उपाय करने की जरूरत है। उनका मानना है कि सिर्फ सर्दी के महीनों में आपातकालीन प्रतिबंधों पर निर्भर रहने से काम नहीं चलेगा।
