Tamil Nadu: होश संभाला तो राजनीतिक विचारधारा से घिरा पाया। युवावस्था में कदम रखा तो खुद को सलाखों के पीछे पाया। सियासी राह पर सफर बढ़ा तो मुख्यमंत्री बन गए। ये कहानी है तमिलनाडु के मुख्यमंत्री मुथुवेल करुणानिधि स्टालिन की। एक मार्च, 1953 को जन्मे स्टालिन, दिग्गज द्रविड़ नेता एम. करुणानिधि और दयालु अम्माल के तीसरे बेटे थे। राजनीतिक माहौल में पले-बढ़े स्टालिन, द्रविड़ आंदोलन के सामाजिक न्याय, समानता और तमिल पहचान के आदर्शों की गहराई से प्रभावित थे। उनका नाम सोवियत नेता जोसेफ स्टालिन के नाम पर रखा गया था, जिनका निधन उनके जन्म से कुछ ही दिन पहले हुआ था। स्टालिन का नाम राजनीतिक रूप से प्रतीकात्मत है।
अमूमन सियासी उत्तराधिकारियों में शुरू से ही ऊंचे पद पर बैठने की परंपरा रही है। स्टालिन इसके विपरीत थे। उन्होंने किशोरावस्था में, 1960 के दशक के उत्तरार्ध से पार्टी के लिए प्रचार करना शुरू कर दिया था। आपातकाल के दौरान 1975 में 23 साल के स्टालिन को मद्रास सेंट्रल जेल में कई महीने बिताने पड़े। उन्होंने अदालत में जज को बताया कि किस तरह जेलर उनसे और दूसरे कैदियों के साथ क्रूर व्यवहार करता था। इस निर्भीकता से डीएमके कार्यकर्ताओं के बीच उनके सम्मान में भारी इजाफा हुआ।
स्टालिन को पहली चुनावी कामयाबी 1989 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में थाउजेंड लाइट्स सीट से मिली। वे पहले थाउजेंड लाइट्स और बाद में कोलाथुर का प्रतिनिधित्व करते हुए सात बार विधायक चुने गए हैं। अभी तक के सियासी सफर में उनके नाम कई उपलब्धियां दर्ज हैं। इनमें 1996 में चेन्नई के महापौर, 2018 में डीएमके अध्यक्ष और फिर सात मई, 2021 को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री का पदभार संभालना शामिल हैं। पार्टी प्रमुख के रूप में, उन्होंने डीएमके के राजनीतिक आधार में नई जान फूंकने और मजबूत बनाने की दिशा में कई काम किए। “नमक्कू नामे” यात्रा जैसे जनसंपर्क कार्यक्रम शुरू किए और धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील गठबंधन की सोच के तहत कांग्रेस समेत कई दलों के साथ हाथ मिलाया।
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स्टालिन खुद को संघवाद और सामाजिक न्याय का रक्षक मानते रहे हैं। अक्सर नीतियों को लेकर केंद्र सरकार से और राज्य स्वायत्तता और पहचान के मुद्दों पर विपक्ष से उनका टकराव होता रहा है। उनकी सियासी रणनीति में जमीनी स्तर पर लामबंदी और गठबंधन का संयोजन है। जानकारों का मानना है कि हाल के सालों में उनकी नेतृत्व शैली में बदलाव आया है – अपेक्षाकृत शांत राजनीतिक व्यक्तित्व से मुखर फैसला लेने वाले के रूप में। खास कर गठबंधन के लिए बातचीत और पार्टी को मजबूत बनाने जैसे विषयों पर। परंपरागत रूप से तमिलनाडु की चुनावी जंग हमेशा डीएमके और एआईएडीएमके के बीच रही है। हालांकि, 2026 विधानसभा चुनाव से पहले, स्टालिन ने ‘तमिलनाडु बनाम एनडीए’ का नारा दिया था।
बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार को चुनौती देकर स्टालिन इंडिया गठबंधन के प्रमुख नेता बन गए हैं। उनका दावा है कि दक्षिण भारतीय राज्यों पर असर डालने वाले और विपक्ष की आवाज दबाने वाले मुद्दों पर उनका रुख बेहद कड़ा है। द्रविड़ मॉडल 2.0 के तहत स्टालिन के चुनावी वादे राज्य के अधिकारों और उसके सामाजिक-आर्थिक विकास पर केंद्रित हैं। वे बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार और एआईएडीएमके नेता एडप्पाडी पलानीस्वामी की लगातार आलोचना करते रहे हैं। उनके मुताबिक डीएमके ही राज्य की पहचान का इकलौता पैरोकार है। क्या ये मुद्दे उनकी सत्ता बरकरार रख पाएंगे? चार मई को इस अहम सवाल का जवाब मिल जाएगा।
