‘समानता केवल कागजों पर नहीं, हकीकत में दिखनी चाहिए’- सीजेआई सूर्यकांत

Chief Justice Suryakant

Chief Justice Suryakant : प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने शनिवार को विधि पेशे में महिलाओं के लिए ‘औपचारिक समानता’ को वास्तविक, व्यावहारिक अनुभवों में बदलने की आवश्यकता पर बल दिया।उन्होंने इसी के साथ महिलाओं की निरंतर भागीदारी और उन्नति सुनिश्चित करने के लिए ढांचागत सुधारों और सतत संस्थागत समर्थन की अपील की।प्रधान न्यायाधीश ने बेंगलुरू के बाहरी इलाके में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) द्वारा आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन-2026 में ‘न्यायिक शासन की पुनर्कल्पना: लोकतांत्रिक न्याय के लिए संस्थानों का सुदृष्ढ़ीकरण’ विषय पर परिचर्चा के दौरान एक सर्वेक्षण के प्रमुख निष्कर्षों को रेखांकित किया

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जिसमें महिला वकीलों के सामने आने वाली चुनौतियों और प्रणालीगत समाधानों की आवश्यकता को दर्शाया गया है।न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, “मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि जब हम अपने संवैधानिक ढांचे के भीतर समानता की बात करते हैं (Chief Justice Suryakant) तो ये समानता केवल कागजी नहीं होनी चाहिए। इसलिए समानता को वास्तविकता में तब्दील करना होगा।’उन्होंने महिला वकीलों द्वारा तैयार किए गए सर्वेक्षण की तारीफ करते हुए इसे ‘‘एक अत्यंत उल्लेखनीय और वैज्ञानिक सर्वेक्षण’’ और ‘‘आंखें खोलने वाला’’ बताया, जो चुनौतियों की पहचान और समाधान के लिए मार्गदर्शन करता है।Chief Justice Suryakant Chief Justice Suryakant Chief Justice Suryakant Chief Justice Suryakant

सीजेआई ने उत्साहजनक रुझानों की ओर इशारा करते हुए कहा कि अब विधि विद्यालयों में 50 प्रतिशत से अधिक विद्यार्थी छात्राएं हैं और बार में नए प्रवेशकों में भी उनका एक अच्छा खासा अनुपात है। हालांकि, उन्होंने वकीलों के बीच में ही पेशा छोड़ने की दर पर चिंता जताई।समस्या इसके बाद शुरू होती है। क्या हम जीवन में प्रगति के बाद के चरणों में, पेशेवर जीवन में प्रगति के दौरान, उस समानता को बनाए रख पा रहे हैं?आइए उन मुद्दों, चुनौतियों, बाधाओं और अड़चनों की पहचान करें, जो अंततः महिलाओं को समानता से वंचित कर रहे हैं।

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ठोस उपाय सुझाते हुए प्रधान न्यायाधीश ने सरकारी पैनल और कानूनी सहायता में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने का आह्वान किया।उन्होंने कहा, ‘‘हमें 30 प्रतिशत से संतुष्ट नहीं होना चाहिए – कम से कम 50 प्रतिशत महिला वकीलों को सरकारी वकील के रूप में पैनल में शामिल किया जाना चाहिए। कानूनी सहायता समितियों में भी इसी तरह का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

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