Bihar Politics: कभी नरेंद्र मोदी, ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल जैसे नेताओं के लिए चुनावी जीत के सूत्रधार रहे प्रशांत किशोर अब खुद विधानसभा का उप-चुनाव जीत गए हैं। बिहार के बांकीपुर उप-चुनाव में प्रशांत किशोर ने बीजेपी को उसी के गढ़ में 19 हजार 324 वोटों से मात दे दी। तीन अगस्त को आए चुनावी नतीजों ने हर किसी को हैरान कर दिया।Bihar Politics:
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चुनावी राजनीति में अपने पहले ही प्रयास में मिली इस जीत ने, उनकी जन सुराज पार्टी के लिए बिहार विधानसभा में अपनी पकड़ मजबूत करने के द्वार खोल दिए हैं।राजनीतिक रणनीतिकार से राजनेता बने प्रशांत किशोर की जीत लगभग दो साल लंबे संघर्ष का नतीजा है। पिछली साल हुए बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान जन सुराज पार्टी ने पूरे राज्य में ताल ठोकी थी। Bihar Politics:
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व्यापक प्रचार अभियान के बावजूद, उनकी पार्टी पिछले साल के बिहार विधानसभा चुनाव में एक भी सीट जीतने में नाकाम रही लेकिन अब उप-चुनाव में जीत के बाद उनकी पार्टी का खाता खुल गया है।प्रशांत किशोर हमेशा से ये कहते आए हैं कि जिस देश में आबादी का एक बड़ा हिस्सा जीवनयापन के लिए जद्दोजहद करता है, वहां एक भरोसेमंद विपक्ष के लिए हमेशा जगह रहेगी।
बांकीपुर उप-चुनाव में विपक्षी इंडिया ब्लॉक बुरी तरह हार चुका है, ऐसे में प्रशांत की जन सुराज पार्टी जनता की आवाज बन सकती हैप्रशांत किशोर का जन्म 1977 में बिहार के रोहतास जिले के कोनार गांव में हुआ। जब उनके पिता का तबादला बक्सर में हुआ, तो प्रशांत उनके साथ चले गए और हाई स्कूल तक वहीं पढ़ाई की। Bihar Politics:
उन्होंने 10वीं कक्षा के बाद लगभग दो साल तक स्कूल छोड़ दिया और फिर पटना साइंस कॉलेज में दाखिला लिया। बाद में उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज में सांख्यिकी का अध्ययन करने के लिए दाखिला लिया, लेकिन खराब सेहत के कारण स्नातक की पढ़ाई पूरी किए बिना ही घर लौटना पड़ा।इसके बाद उन्होंने लखनऊ से स्नातक और हैदराबाद से स्नातकोत्तर किया।वैसे जन सुराज पार्टी पीके का पहला संगठन नहीं है जिसमें वे एक नेता के रूप में सक्रिय हैं।
चुनाव प्रबंधन में उनकी कुशलता ने उन्हें एक वक्त नीतीश कुमार का प्रिय बना दिया था। 2015 में नीतीश ने मुख्यमंत्री के रूप में वापसी करने के बाद उन्हें अपना सलाहकार नियुक्त किया जो कैबिनेट मंत्री के दर्जे के बराबर था।तीन साल बाद, वे जेडीयू में शामिल हो गए और जल्दी ही पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बन गए, जिससे ये अटकलें लगने लगीं कि नीतीश उन्हें अपनी विरासत का उत्तराधिकारी मानते हैं।Bihar Politics:
हालांकि करीब एक साल बाद नागरिकता संशोधन अधिनियम पर नीतीश कुमार के अस्पष्ट रुख की खुलेआम आलोचना करने के कारण उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया। सीएए को लेकर तब देश में विरोध-प्रदर्शन का लंबा दौर चला था।पार्टी से निकाले जाने के तुरंत बाद प्रशांत ने ‘बात बिहार की’ नाम से एक अभियान शुरू करने की घोषणा की, लेकिन तब वो सफल नहीं हो सका।Bihar Politics:
