Education : गाजियाबाद की घटना ने फिर उठाया सवाल, बच्चों के नंबर से ज्यादा जरूरी है उनका मानसिक सुकून और स्कूल-पैरेंट्स का संवाद
News Desk : गाजियाबाद में सातवीं कक्षा की छात्रा की मौत की घटना ने बच्चों पर पढ़ाई और नंबरों के बढ़ते दबाव को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। परिवार की ओर से गणित में कम नंबर और स्कूल में कथित दबाव को लेकर आरोप लगाए गए हैं, जिसकी पुलिस जांच कर रही है। इस घटना को केवल एक छात्रा की परेशानी के तौर पर देखने के बजाय यह समझना जरूरी है कि पढ़ाई को लेकर लगातार डर, कम नंबर आने की चिंता या शिक्षक और माता-पिता की नाराजगी का डर बच्चों पर कितना असर डाल सकता है। कई बार बच्चे अपनी परेशानी खुलकर नहीं बताते, इसलिए उनके व्यवहार में आने वाले बदलाव को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।Education
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पैरेंट्स के लिए सबसे जरूरी है कि नंबरों को बच्चे की काबिलियत का पैमाना न बनाएं। अगर किसी विषय में कम अंक आते हैं तो सबसे पहले बच्चे से यह समझने की कोशिश करें कि दिक्कत कहां है। उसे डांटने या दूसरे बच्चों से तुलना करने के बजाय पढ़ाई की समस्या को छोटे हिस्सों में बांटकर हल किया जा सकता है। अगर बच्चा अचानक चुप रहने लगे, स्कूल जाने से डरने लगे, पढ़ाई के नाम पर परेशान हो, नींद या खाने की आदत में बदलाव आए या बार-बार खुद को असफल बताए, तो इन संकेतों को गंभीरता से लेना चाहिए। जरूरत पड़ने पर स्कूल काउंसलर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद भी ली जा सकती है।Education
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स्कूलों की भी जिम्मेदारी केवल रिजल्ट और नंबरों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। शिक्षकों को कमजोर प्रदर्शन करने वाले बच्चों की पहचान करके उन्हें अतिरिक्त अकादमिक मदद देनी चाहिए, लेकिन इसके साथ यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि सुधार के नाम पर बच्चे को सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा या लगातार दबाव में महसूस न कराया जाए। स्कूलों में नियमित काउंसलिंग, पैरेंट-टीचर संवाद और बच्चों के लिए सुरक्षित शिकायत व्यवस्था होनी चाहिए। किसी बच्चे के व्यवहार या भावनात्मक स्थिति में अचानक बदलाव दिखाई दे तो स्कूल और परिवार को मिलकर उससे बात करनी चाहिए। पढ़ाई में सुधार जरूरी है, लेकिन बच्चे का आत्मविश्वास, सुरक्षा और भावनात्मक स्वास्थ्य उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है।Education
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