Arunachal Pradesh: अरुणाचल प्रदेश में रविवार 19 अप्रैल को न्याशी समुदाय ने 19वां न्याशी दिवस पूरे उत्साह और गौरव के साथ मनाया। ईटानगर के रिची जुल्लांग स्थित न्याशी एलीट सोसाइटी अनुसंधान एवं विरासत केंद्र में हुए मुख्य समारोह में केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए। उन्होंने युवा पीढ़ी से अपनी संस्कृति और जड़ों से जुड़े रहने की भावुक अपील की।
अरुणाचल प्रदेश के न्याशी-बहुल इलाकों में रविवार को जश्न का माहौल रहा। मौका था 19वें न्याशी दिवस का। ये दिन न्याशी समुदाय द्वारा “न्याशी” नाम को अपनाने और उसे संवैधानिक मान्यता मिलने की ऐतिहासिक याद में हर साल 19 अप्रैल को मनाया जाता है।
समारोह की खास बातें
1. रिची जुल्लांग में मुख्य आयोजन- राजधानी ईटानगर के रिची जुल्लांग स्थित न्याशी एलीट सोसाइटी यानी NES के अनुसंधान एवं विरासत केंद्र में भव्य समारोह हुआ। पारंपरिक वेशभूषा में सजे समुदाय के लोग बड़ी संख्या में पहुंचे। लोक नृत्य, गीत और सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने समां बांध दिया।
2. किरेन रिजिजू मुख्य अतिथि बने- संसदीय एवं अल्पसंख्यक मामलों के केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने समारोह में शिरकत की। उन्होंने न्याशी समुदाय के बुजुर्गों और वरिष्ठ सदस्यों के संघर्ष को याद किया, जिनकी अथक मेहनत से “न्याशी” नाम को पहचान मिली और संविधान में जगह मिली।
3. युवाओं को दिया ‘जड़ों से जुड़ने’ का संदेश- अपने संबोधन में रिजिजू ने कहा कि न्याशी दिवस सिर्फ जश्न नहीं है। ये समुदाय के मूल्यों, गरिमा, प्रगति, एकता, सांप्रदायिक सद्भाव और भाईचारे की याद दिलाता है। उन्होंने युवा पीढ़ी से खास अपील की कि वे आधुनिक बनें, पढ़ाई-लिखाई में आगे बढ़ें, लेकिन अपनी भाषा, परंपरा और जड़ों को कभी न भूलें। समाज के विकास में योगदान दें।
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4. ‘आधी आबादी की जिम्मेदारी बड़ी’- केंद्रीय मंत्री ने एक अहम आंकड़ा रखा। उन्होंने कहा कि अरुणाचल प्रदेश की कुल आबादी का लगभग आधा हिस्सा न्याशी लोगों का है। इसलिए राज्य के विकास में न्याशी समुदाय की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। रिजिजू बोले, “राज्य में सबसे बड़ी आबादी होने के नाते, मेरा मानना है कि न्याशी समुदाय अन्य समुदायों को भी सामूहिक प्रगति की ओर ले जाएगा।” उन्होंने राज्य के विकास में न्याशी लोगों के योगदान को ऐतिहासिक बताया।
5. विरासत बचाने पर जोर- समारोह में न्याशी भाषा, लोक कला और रीति-रिवाजों को बचाने पर चर्चा हुई। NES अनुसंधान केंद्र इन्हीं परंपराओं को दस्तावेज के रूप में सहेजने का काम कर रहा है ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी पहचान से जुड़ी रहें।
