Health Tips: रात के 2 बज रहे हैं, आंखें थकान से बोझिल हैं, शरीर बिस्तर पर पड़ा है… लेकिन दिमाग? दिमाग किसी रेसिंग कार की तरह दौड़ रहा है। कल की डेडलाइन, पुरानी लड़ाई, महीने का बजट, बच्चों का स्कूल… विचारों की लाइन खत्म ही नहीं होती। अगर ये कहानी आपकी है, तो जान लीजिए आप अकेले नहीं हैं। ‘Tired But Wired’ नाम की ये कंडीशन आज हर तीसरे शख्स को परेशान कर रही है। सवाल ये है कि आखिर ऐसा क्यों होता है? शरीर सोना चाहता है पर दिमाग छुट्टी पर क्यों नहीं जाता?
इसका जवाब छिपा है हमारे हार्मोन्स में… हमारे शरीर में दो हार्मोन नींद को कंट्रोल करते हैं- पहला मेलाटोनिन यानी स्लीप हार्मोन, और दूसरा कोर्टिसोल यानी स्ट्रेस हार्मोन। आइडियल सिचुएशन में शाम ढलते ही कोर्टिसोल का लेवल गिरना चाहिए और मेलाटोनिन बढ़ना चाहिए, ताकि हमें नींद आए। लेकिन आज की लाइफस्टाइल ने इस सिस्टम को उल्टा कर दिया है। बता दें, जब हम पूरे दिन स्ट्रेस में रहते हैं, ऑफिस की टेंशन, EMI की चिंता, रिश्तों की खींचतान… तो कोर्टिसोल लगातार रिलीज होता रहता है। ये कोर्टिसोल रात में भी हाई रहता है। ऊपर से सोने से पहले मोबाइल की ब्लू लाइट, लेट नाइट वेब सीरीज, या ऑफिस के मेल… ये सब मेलाटोनिन को बनने ही नहीं देते। नतीजा? बॉडी फिजिकली थक चुकी है, वो रेस्ट मांग रही है। लेकिन ब्रेन केमिकल लेवल पर अभी भी ‘फाइट या फ्लाइट’ मोड में है। इसे ही डॉक्टर ‘हाइपर-अराउजल’ कहते हैं।
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देखिए, ओवरथिंकिंग इन्सोम्निया की सबसे बड़ी वजह है। जब हम बिस्तर पर लेटते हैं, तो दिनभर का शोर बंद हो जाता है। उसी वक्त दिमाग को मौका मिलता है उन सारे दबे हुए विचारों को प्रोसेस करने का। इसे ‘रूमिनेशन’ कहते हैं। आप एक ही बात को बार-बार सोचते हैं, उसका हल ढूंढते हैं, और इसी चक्कर में नींद कोसों दूर चली जाती है।” दिनभर काम के बाद ‘मी-टाइम’ के चक्कर में हम देर रात तक रील्स देखते हैं। दिमाग को लगता है अभी सोना नहीं है। दोपहर 3 बजे के बाद वाली कॉफी का असर 8-10 घंटे तक रहता है। वो रात 11 बजे भी आपको जगा सकती है। एंग्जायटी में दिमाग फ्यूचर के 100 नेगेटिव सिनेरियो बना लेता है। ‘अगर जॉब चली गई तो? अगर रिजल्ट खराब आया तो?’ दिन में इग्नोर किया गया गुस्सा, दुख या गिल्ट रात में दोगुना होकर आता है। वीकेंड पर देर तक सोना, संडे की रात नींद न आना… ये सब सर्केडियन रिदम बिगाड़ देता है। मैग्नीशियम, विटामिन-D की कमी भी नींद और मूड दोनों को खराब करती है।
अब बात समाधान की करें तो सिर्फ ‘फोन दूर रखो’ कहना काफी नहीं है। आपको ‘ब्रेन को शटडाउन’ करना सिखाना होगा। सोने से 1 घंटा पहले एक कागज पर दिमाग में चल रही हर चिंता, हर काम लिख डालिए। ब्रेन को मैसेज जाता है कि ‘सब नोटेड है, अब रिलैक्स’। 4 सेकंड सांस अंदर, 7 सेकंड रोकें, 8 सेकंड में बाहर छोड़ें। ये नर्वस सिस्टम को तुरंत शांत करता है। सोने के 2 घंटे पहले घर की लाइट डिम कर दें। येलो लाइट जलाएं। इससे मेलाटोनिन ट्रिगर होता है। शाम को 30 मिनट वॉक या योगा करें। फिजिकल थकान नैचुरल नींद लाती है। लेकिन हैवी वर्कआउट रात 8 के बाद न करें। दिन में 15 मिनट ‘चिंता करने का टाइम’ तय करें। उसी वक्त सारी टेंशन सोच लें। रात में दिमाग आए तो खुद से कहें- ‘इसका टाइम कल 5 बजे है’।
