Rajasthan News: राजस्थान में सावन का महीना तीज, सिंजारा और घेवर के बिना अधूरा है। मैदे, दूध और देसी घी से बनी यह कुरकुरी और मधुमक्खी के छत्ते जैसी दिखने वाली मिठाई, सिर्फ एक मिठाई से कहीं बढ़कर है। घेवर एक ऐसी पारंपरिक मिठाई है जो तीज के जश्न, शादियों और पारिवार में खास समारोहों के मौकों का अहम हिस्सा है।
चूंकि अब तीज का त्योहार आने ही वाला है, ऐसे में राजस्थान की राजधानी जयपुर की मिठाई की दुकानों पर इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है। शादियों में तोहफे के तौर पर और विवाहित बेटियों और बहनों को सिंजारा के उपहार के रूप में दिए जाने वाले घेवर में भी लोगों की बदलती पसंद के साथ बदलाव आए हैं। खास रबड़ी और मावा वैरायटी से लेकर केसर, चॉकलेट और स्ट्रॉबेरी फ्लेवर तक, अब हर पीढ़ी को लुभाने के लिए घेवर में कई तरह के विकल्प मौजूद हैं। Rajasthan News
“तीज और गनगौर पर घेवर की ज्यादा डिमांड रहती है। जिन भी जोड़ों की शादी होती है हिंदू परिवारों की, तो उनको बाद में सिंजारा दिया जाता है, शादी के बाद दिए जाते हैं घेवर, शादी के पहले भी दिए जाते हैं, विशेषकर तीज बहुत खास, बहुत बड़ा उत्सव है जिसमें घेवर बहुत ज्यादा चलते हैं।” “घेवर हम दो ही तरह के बनाते हैं। एक चार इंची और एक सात इंची। बाकी रबड़ी के अंदर वैराइटी अलग-अलग हैं। रबड़ी में चॉकलेट भी बनाते हैं, केसर भी बनाते हैं, स्ट्रॉबेरी भी बनाते हैं और प्लेन रबड़ी भी बनाते हैं।” Rajasthan News
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“यहां पर 50 साल से बनते आ रहे हैं सर। 50 साल से ये तीन-चार प्रकार के घेवर होते हैं, मावे के होते हैं, देसी घी के ही बनते हैं। मावे की ही मिठाई मिलती है यहां पे, और अन्यथा कुछ भी नहीं मिलता।” “ये बनता है मैदा, देसी घी और दूध, तीनों चीजें मिलकर ही बनता है देसी घी से।” Rajasthan News
हाल के सालों में, जयपुर के मशहूर घेवर का स्वाद ‘पिंक सिटी’ से कहीं आगे तक पहुंच गया है। ताजगी बनाए रखने के लिए खास पैकेजिंग के साथ, त्योहारों की यह खास मिठाई अब पूरे भारत और विदेशों में भी भेजी जा रही है, जिससे दुनिया भर के घरों तक राजस्थान का स्वाद पहुंच रहा है। “आज की जेनरेशन रबड़ी का घेवर बहुत लाइक करते हैं वो लोग।”
“विदेश के हिसाब से अलग पैकिंग हो जाती है, घेवर विदेश खूब जा रहा है, जयपुर से बाहर भी खूब जा रहा है, अपने ऑलओवर इंडिया भी खूब लेकर जाते हैं घेवर, जयपुर का घेवर बहुत ज्यादा जाता है।” त्योहारों में पसंद की जाने वाली इस खास मिठाई से जुड़ा इतिहास भी बेहद खास है, जिसे बहुत कम लोग जानते हैं। इतिहासकारों के मुताबिक, घेवर की शुरुआत सांभर में हुई थी। शाही घरों तक पहुंचने के बाद, यह धीरे-धीरे जयपुर की तीज परंपराओं का अहम हिस्सा बन गया। Rajasthan News
“घेवर सबसे पहले शुरू हुए थे सांभर में, घेवर और फिरनी। यहां का जो नमक का पानी है उससे बहुत अलग स्वाद आता है और मौसम के हिसाब से ये मैदा के बनते हैं तो कोई इसका केमिकल इफेक्ट होता होगा स्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छे रहते हैं ये। फिर ये धीरे-धीरे राजे-रजवाड़ों में आए, सबसे पहले जयपुर में आए। अब तो तीज की सवारी निकलती है सावन के महीने में, उसमें महारानी सबसे पहले तीज माता को घेवर का भोग लगाती है, उसके बाद आचमन कराकर उनकी पूजा करके फिर सवारी रवाना कराते हैं।”
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लोगों को घेवर के बिना सावन अधूरा लगता है, इसलिए यह त्योहार के मौसम में एक जरूरी चीज बन गया है। घेवर को लेकर एक पारंपरिक मान्यता है कि डायबिटीज यानी मधुमेह के रोगी भी इसे खा सकते हैं और इससे उनके ब्लड शुगर स्तर में कोई खास बढ़ोतरी नहीं होती। हालांकि इन दावों की मेडिकल तौर पर पुष्टि नहीं हुई है। “ये घेवर की खासियत ये है कि शुगर वाला पेशेंट भी घेवर को खा सकता है क्योंकि माता जी का ऐसा आशीर्वाद है कि शुगर वाला पेशेंट अगर घेवर खा ले तो ज्यादा प्रॉब्लम नहीं होगी। वही शुगर रहेगा, बल्कि कम ही हो जाएगा, ऐसी मान्यता है। राजा-महाराजाओं के टाइम से तीज से ही घेवर का प्रचलन शुरू हुआ सावन पे। अब तो बड़े-बड़े देश-विदेश से घेवर जाते हैं यहां से।”
ऐसा बोला जाता है कि अगर सावन के महीने में घेवर नहीं खाया तो कुछ नहीं खाया। खाना जरूरी होता है, हमारी राजस्थानी परंपराओं के हिसाब से सावन के महीने में घेवर अत्यंत शुभ और अच्छी मिठाई मानी जाती है खाने के हिसाब से। तीज भी आ रही है, लोग सिंजारे भी लेकर जाते हैं, तो लोग इस मिठाई को, बहुत अच्छी तरह से देखा जाता है, पर्व पर खाई जाने वाली सबसे अच्छी मिठाई घेवर है।” Rajasthan News
शाही परंपराओं से लेकर पारिवारिक उत्सवों तक, और स्थानीय मिठाई की दुकानों से लेकर दुनिया भर के घरों तक, राजस्थान का मशहूर घेवर सावन का एक अहम हिस्सा बन चुका है और लोगों को अपना मुरीद बना चुका है। Rajasthan News

