20 साल पुरानी, फिर भी आज उतनी ही प्रासंगिक ‘रंग दे बसंती’- राकेश ओमप्रकाश मेहरा

20th Anniversary of Rang De Basanti, Rakeysh Omprakash Mehra’s Rang De Basanti follows a group of carefree Indian youths who, while portraying freedom fighters in a documentary, awaken to political corruption and take a stand for justice

20th Anniversary of Rang De Basanti: स्वतंत्रता संग्राम के दौरान युवाओं ने कलम छोड़कर बंदूक क्यों उठाई? ​​राकेश ओमप्रकाश मेहरा अपनी फिल्म “रंग दे बसंती” के 20 साल पूरे होने पर बताते हैं कि यही सवाल और भगत सिंह का जेल से लिखा गया ये पत्र कि आजादी इंसानों के शोषण से ही मिलेगी फिल्म के लिए प्रेरणा का स्रोत बना।कवि साहिर लुधियानवी भी इस फिल्म के लिए एक प्रेरणास्रोत थे। ये फिल्म 26 जनवरी, 2006 को गणतंत्र दिवस पर सिनेमाघरों में रिलीज हुई थी 20th Anniversary of Rang De Basanti  20th Anniversary of Rang De Basanti

जिसे युवाओं और आदर्शवाद के विषय को प्रभावी ढंग से भुनाने के लिए सोच-समझकर चुना गया था।फिल्म की 20वीं सालगिरह पर पीटीआई वीडियो दिए एक खास साक्षात्कार में बताया, “साहिर की कविता, ‘बहुत दिनों से है यह मशगला सियासत का, कि जब जवान हों बच्चे तो कत्ल हो जाएं…’ यहीं इस दीवार पर चिपकी हुई थी। मैंने हर दिन उसे देखकर फिल्म लिखी।20th Anniversary of Rang De Basanti 

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मेहरा ने इन प्रसिद्ध पंक्तियों का हवाला देते हुए कहा, जिनका अर्थ है, “सत्ता में बैठे लोगों का यह पुराना शौक रहा है कि जब हमारे बच्चे बड़े हो जाते हैं, तो उनकी बलि चढ़ा दी जाती है।” अपने गीतों और विषयवस्तु के लिए याद की जाने वाली उनकी यह फिल्म, चार बेफिक्र कॉलेज के दोस्तों की नजर से युवा क्रांति की कहानी बयां करती है। ये दो मुख्य पहलुओं पर आधारित है – एक तो भगत सिंह पर बनी डॉक्यूमेंट्री के लिए चुने गए चार युवकों की कहानी और दूसरा भगत सिंह, राजगुरु, चंद्रशेखर आजाद और अशफाकुल्ला खान के भावपूर्ण और प्रेरणादायक संघर्ष की कहानी।20th Anniversary of Rang De Basanti

राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने कहा कि आमिर खान, कुणाल कपूर, सिद्धार्थ, आर. माधवन और वहीदा रहमान जैसे कलाकारों से सजी ये फिल्म 20 साल पुरानी है, लेकिन इसका संदेश और सामाजिक प्रभाव आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना तब था।”दिल्ली 6″ और “भाग मिल्खा भाग” के लिए भी जाने जाने वाले निर्देशक ने बताया कि “रंग दे बसंती” उनकी दूसरी फिल्म थी और पूरी टीम ने सफलता की चिंता किए बिना अपने मन पर भरोसा किया।मेहरा ने कहा, “उस दौर के युवाओं ने कलम छोड़कर बंदूक क्यों उठाई? ​​उन्हें किस बात ने प्रेरित किया? यह बात मुझे हमेशा से उत्सुक करती रही है।

उन्होंने कहा, “जेल से भगत सिंह द्वारा लिखे एक पत्र में उन्होंने कहा था, ‘हम गोरों (अंग्रेजों) से आजादी नहीं चाहते, खुद के ही गुलाम बनकर नहीं रहना चाहते। इसलिए आजादी इंसानों द्वारा इंसानों के शोषण से ही मिलनी चाहिए और आज हम अंग्रेजों से आजादी हासिल करेंगे, क्योंकि हमारे ही लोग हमारा शोषण करेंगे।’ मुझे कहना होगा कि उनकी भविष्यवाणी दुखद रूप से सच साबित हुई। एक राष्ट्र के रूप में हम अमीर और गरीब, संपन्न और निर्धन में बुरी तरह बंटे हुए हैं।20th Anniversary of Rang De Basanti 

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फिल्म के लिए कलाकारों का चयन करते समय, मेहरा को ऐसे कलाकार मिले जो फिल्म में निभाई जाने वाली दोहरी भूमिकाओं के लिए बिल्कुल सही थे। फिल्म की शुरुआत एक युवा ब्रिटिश महिला द्वारा दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों को डॉक्यूमेंट्री के लिए भर्ती करने के प्रयास से होती है।जब उनके एक दोस्त की मिग विमान दुर्घटना में मृत्यु हो जाती है, तो छात्र रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने के लिए हथियार उठाने का फैसला करते हैं।फिल्म का शीर्षक भगत सिंह और उनके दोस्तों द्वारा बैसाखी के मेलों में किए जाने वाले नुक्कड़ नाटकों से प्रेरित है।

मेहरा ने बताया कि शुरुआती विचार युवा क्रांतिकारियों और काकोरी ट्रेन डकैती, जॉन सॉन्डर्स की हत्या और जलियांवाला बाग हत्याकांड पर फिल्म बनाने का था। मेहरा और लेखक कमलेश पांडे ने इस विषय पर आधारित एक कहानी लिखी और उसका नाम “द यंग गन्स ऑफ इंडिया” रखा।लेकिन जब उन्होंने मुंबई में युवाओं के एक समूह को कहानी सुनाई, तो उन्हें वो जुड़ाव नहीं मिला जिसकी वे तलाश कर रहे थे। युवा लड़के-लड़कियां अपने करियर की योजना बनाने और विदेश में बसने में व्यस्त थे।20th Anniversary of Rang De Basanti20th Anniversary of Rang De Basanti 

मेहरा ने दिल्ली में भी यही प्रयोग किया, लेकिन परिणाम और भी निराशाजनक रहे।उन्होंने कहा, “लोग ऐसी बातें कह रहे थे कि ‘अगर भगत सिंह आज होते, तो वो सेना या बैंक में नौकरी करते’, जिससे मेरा दिल टूट गया… लेकिन फिर ये कहानी सामने आई। तो दो समानांतर दुनियाएं, एक 1920 के दशक की और दूसरी 2000 की… ये एक-दूसरे को काटती हैं।दिल्ली में पले-बढ़े मेहरा ने बताया कि इंडिया गेट उनका खेल का मैदान था और वो अक्सर अमर जवान ज्योति पर श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए रुकते थे, जो 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में शहीद हुए भारतीय सैनिकों की याद में बना स्मारक है।

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उन्होंने कहा, “देशभक्ति का मतलब ‘रंग दे बसंती’ की तरह सीना ठोकना नहीं है और न ही मेरी मान्यता के अनुसार किसी पड़ोसी देश पर उंगली उठाना है। देशभक्ति कहीं ज्यादा समावेशी है और इसका अर्थ कहीं अधिक गहरा है, इसका मतलब है कि आपको इस देश को चलाने में खुद काम करना होगा और यही इस फिल्म का अंतिम संदेश था।20th Anniversary of Rang De Basanti 20th Anniversary of Rang De Basanti

मेहरा ने कहा कि फिल्म बनाने में कई तरह की चुनौतियां और बजट संबंधी समस्याएं आईं। उन्होंने टीम की प्रशंसा करते हुए कहा कि वो दो साल तक हर सुख-दुख में उनके साथ बने रहे।उन्होंने बताया कि पूरे दो साल मैं इस फिल्म के लिए पैसों की कमी से जूझता रहा। लेकिन उन दो सालों में एआर रहमान, आमिर खान और बाकी सभी (कलाकार और क्रू) मेरे साथ खड़े रहे और कहते रहे, ‘तुम ये फिल्म बनाओ, इसे पूरा करो, एक दिन जरूर बनाओगे’।

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